lord dalahauji ki samrajya vistar ki niti

लॉर्ड डलहौजी (lord dalahauji) जनवरी, 1848 ई० में गवर्नर जनरल बनकर भारत आया। वह एक प्रबल साम्राज्यवादी था उसकी तीव्र अभिलाषा थी कि वह देशी राज्यों को समाप्त करके भारत में अंग्रेजी राज्य विस्तार करे, चाहे इसके लिए उसे कितनी भी अनैतिकता का मार्ग क्यों न अपनाना पड़े। अतः उसने अपनी अभिलाषा की पूर्ति हेतु निम्नलिखित नीतियों का अनुसरण किया।

(क) युद्ध की नीति

उसने युद्ध की नीति द्वारा निम्नलिखित राज्यों को ब्रिटिश साम्राज्य में मिलाया
1. पंजाब - जिस समय लॉर्ड डलहौजी (lord dalahauji) भारत आया उस समय पंजाब की स्थिति ब्रिटिश साम्राज्य के प्रतिकूल थी। सिक्ख समुदाय अंग्रेजों को घृणा की दृष्टि से देखा करता था। सिक्ख अंग्रेजों से बहुत असंतुष्ट थे। प्रथम सिक्ख युद्ध के बाद तो वह अंग्रेजों से और भी अधिक घृणा करने लगे थे। कुछ अन्य कारणों के फलस्वरूप भी सिखों और अंग्रेजो में 1848-49 ईसवी में द्वितीय सिक्ख युद्ध (sikkh yuddh) हुआ था जिसमें सिक्खों की पराजय हुई। लॉर्ड डलहौजी ने पंजाब को भी ब्रिटिश राज्य में मिला लिया और राजा दिलीप सिंह को 50 हजार पौंड वार्षिक पेंशन देकर इंग्लैंड भेज दिया। पंजाब का प्रशासन चलाने के लिए तीन कमिश्नरों की एक विशिष्ट समिति बना दी गई। इससे कंपनी को यह लाभ हुआ कि इसकी पश्चिमी सीमा सुरक्षित हो गई।

2. सिक्किम - नेपाल और भूटान के बीच एक छोटा सा राज्य सिक्किम अनिश्चितता पूर्ण स्थिति में था पंजाब के बाद डलहौजी ने इस राज्य पर आक्रमण कर दिया और 1849 ईसवी में इसे अंग्रेजी साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया

3. बर्मा (म्यांमार) - सिक्किम के बाद डलहौजी की दृष्टि वर्मा पर गई इस समय वर्मा की अनिश्चयपूर्ण स्थिति थी। 1852 ईसवी में वर्मा का द्वितीय विश्व हुआ। इस युद्ध में 'मर्द्बान' एवं संपूर्ण वर्मा पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया। अंग्रेजों ने वर्मा के नगर रंगून को खूब लूटा। बर्मा के निचले भाग और पीगू को भी डलहौजी ने अंग्रेजी साम्राज्य में मिला लिया।

(ख) राज्य हडपने की नीति

डलहौजी साम्राज्यवादी शासक था। अतः वह साम्राज्य विस्तार करने में उचित-अनुचित पर विचार नहीं करता था। उसने अपनी इच्छा पूर्ण करने के लिए 'गोद-निषेध' नियम बनाकर अनेक राज्यों का अपहरण किया। 'गोद-निषेध' नियम का यह अर्थ था कि कोई भी भारतीय राजा संतानहीन होने पर ब्रिटिश सरकार की आज्ञा के बिना किसी को उत्तराधिकारी बनाने के लिए गोद नहीं ले सकता था। संतानहीन राजाओं की मृत्यु के पश्चात उनके राज्यों पर कंपनी का अधिकार माना जाता था। डलहौजी ने अपनी इस 'गोद-निषेध' नीति में निम्नलिखित राज्यों को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया था।

1. सातारा - 1848 ई० में सतारा के राजा की मृत्यु हो गई उसके कोई संतान नहीं थी। मृत्यु से पूर्व उसने एक बालक को विधान एवं रीतियों द्वारा बिना अंग्रेजी रेजिडेंट की स्वीकृत के गोद ले लिया था। डलहौजी ने अपने नियमानुसार गोद लिए हुए व्यक्ति को उत्तराधिकारी स्वीकार नहीं किया तथा सतारा राज्य को ब्रिटिश राज्य में मिला लिया उसका यह कार्य बहुत ही अनुचित था।

2. झांसी - 1853 ई० में झांसी के राजा गंगाधर राव की मृत्यु हो गई उसने मृत्यु से पूर्व कंपनी सरकार से आज्ञा लेकर दामोदर राव नामक बालक को गोद लिया था लेकिन डलहौजी ने दामोदर राव को अवैध घोषित कर दिया तथा रानी लक्ष्मीबाई को हटाकर झाँसी का भी ब्रिटिश सरकार में विलय कर लिया।

3. नागपुर - 1854 ई० नागपुर के राजा राघोजी की मृत्यु हुई। वे भी निःसंतान थे। उन्होंने अपनी जीवन लीला की समाप्ति के समय एक बालक को गोद लेने के लिए कम्पनी को पत्र लिखा। उनकी मृत्यु से पूर्व कंपनी का उत्तर नहीं आया और वे अपनी पत्नी यशवन्तराव को गोद लेने की आज्ञा देकर स्वर्गवासी हो गए। परंतु यशवंतराव को नागपुर का शासक स्वीकार नहीं किया गया और नागपुर को भी कंपनी के साम्राज्य में मिला लिया गया।

4. अन्य छोटे छोटे राज्य - उपर्युक्त राज्यों के डलहौजी ने इस नियम के आधार पर संभलपुर, जयपुर, बाघात तथा उदयपुर जैसे चार छोटे राज्यों का भी अंग्रेजी साम्राज्य में विलय कर लिया।

(ग) कुशासन का आरोप लगाकर राज्यों का अपहरण करने की नीति

अनेक राज्यों को अनैतिक ढंग से ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लेने के बाद भी डलहौजी की इच्छा तृप्त नही हुई। उसने कुछ राज्यों के ऊपर यह आरोप लगाया कि वहां का शासन ठीक ढंग से नहीं चल पा रहा है, जिससे वहां की जनता बहुत दुखी एवं कठिनाई में है। इन राज्यों की जनता की भलाई के लिए वहां कंपनी का शासन आवश्यक है। यह आरोप लगाकर उसने अग्रलिखित राज्यों पर अंग्रेजी सत्ता का अधिकार स्थापित कर दिया।

1. बरार - डलहौजी के समय बरार प्रांत में प्रतिदिन हिंदू-मुस्लिम विवाद होते रहते थे जिससे वहां शांति नहीं थी। डलहौजी शांति स्थापित करने का बहाना बनाकर एक अंग्रेजी सेना निजाम के व्यय पर रखी गई, लेकिन निजाम इस व्यय को समय से नहीं दे पाता था। अतः डलहौजी ने पुनः निजाम को बहकाकर उसके राज्य बरार को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया।

2. अवध - डलहौजी के समय अवध राज्य में भी शासन-व्यवस्था अस्त-व्यस्त थी अवध के नवाब वाजिदअली शाह को शासन-व्यवस्था ठीक करने की आज्ञा दी, लेकिन उसने ध्यान नहीं दिया। अतः डलहौजी ने उसे स्वेच्छा से राज्य देने को कहा, लेकिन वाजिदअली शाह नहीं माना परिणाम स्वरुप उसके राज्य पर सेना द्वारा बलपूर्वक अधिकार कर लिया गया। नवाब वाजिदअली शाह को कोलकाता भेज दिया और उसके महल को लूटा गया। 13 फरवरी, 1856 ई० की तारीख के घोषणा के अनुसार अवध राज्य को कंपनी राज्य में मिला लिया गया।