यह संदेश 12 नवंबर 1947 को प्रसारित किया गया था। उनके इस संदेश के पीछे जो दर्द था उसको वह हरियाणा के कुरुक्षेत्र में रह रहे लाखों शरणार्थियों तक पहुंचाना चाहते थे। बिना रेडियो के ये संदेश उन लोगों तक पहुंचाना संभव नहीं था। ऐसे में पहली और आखिरी बार उन्‍होंने रेडियो का इस्‍तेमाल अपना संदेश उन तक पहुंचाने के लिए किया था। इस संदेश को उन शरणार्थियों तक पहुंचाने के लिए कुरुक्षेत्र में मौजूद शरणार्थियों के बीच में एक तख्‍त पर बापू की तस्‍वीर लगाई गई और एक माइक को वहां रखे रेडियो के सामने लगा दिया गया। इसकी आवाज लाउड स्‍पीकर के जरिये दूर तक पहुंचाई गई थी। बापू का यह भाषण करीब 20 मिनट तक चला।

क्‍या कहा था बापू ने
'मेरे दुखी भाईयों और बहनों। मुझे पता ही नहीं था कि सिवाए आपके मुझे कोई सुनता भी है या नहीं, ये अनुभव मेरे लिए दूसरा है। पहला अनुभव इंग्‍लैंड में हुआ था जब मैं राउंड टेबल कांफ्रेंस में गया था। मुझको पता ही नहीं था कि मुझको इस तरह से कुछ बोलना भी है। मैं तो एक अंजान पुरुष हूं, मैं कोई दिलचस्‍पी भी नहीं लेता हूं, क्‍योंकि दुख के साथ मिल जाना ये तो मेरा जीवन भर का प्रयत्‍न है। जीवनभर का मेरा पेशा है, जब मैंने सुना कि आप लोगों में करीब ढाई लाख रिफ्यूजी पड़े हैं और सुना कि अभी भी लोग आते रहते हैं तो मुझको बड़ा दुख हुआ। मुझे ठेस लगी और मुझे ऐसा अहसास हुआ कि मैं आपके पास पहुंच जाऊं'।