svami dayanand sarasvati

उन्नीसवीं शताब्दी में जिन सामाजिक व धार्मिक आंदोलनों का प्रादुर्भाव हुआ उनमे आर्य समाज सबसे अधिक शक्तिशाली सिद्ध हुआ। स्वामी दयानन्द सरस्वती पुरातन, उपयोगी धार्मिक संस्कृति और नवीन सुधारवादी सभ्यता का समन्वय करने वाले महान समाज-सुधारक थे। इन्होने वेदों को आधार बनाकर अपने आन्दोलन को 'आर्य समाज के रूप में प्रतिष्ठित किया, इसलिए आर्य समाज संस्था आज इक्कीसवीं शताब्दी में भी एक सशक्त संस्था के रूप में धर्म-सुधार के कार्यों में जुटी हुई है।

स्वामी दयानन्द सरस्वती का जन्म 1824 ई० में काठियावाड़ (वर्तमान गुजरात) के टंकारा नामक ग्राम में हुआ था। इनका वास्तविक नाम मूल शंकर था। स्वामी दयानन्द सरस्वती मात्र 22 वर्ष के आयु में ही सन्यासी बन गए थे। मथुरा के स्वामी विरजानन्द को गुरु बनाकर इन्होने 30 वर्ष तक शिक्षा प्राप्त की। इन्होने 1875 ई० में मुम्बई में आर्य समाज की स्थापना की। धीरे-धीरे यह संस्था सम्पूर्ण भारत में फ़ैल गयी।

स्वामी दयानन्द के सिद्धान्तों और व्यवहार से धर्म तथा समाज-सुधार का कार्य बड़ी तेजी से हुआ। स्वामी दयानन्द सरस्वती के शिक्षाओं के अनुसार ईश्वर एक है, वह सर्वगुण सम्पन्न, निराकर, सर्वव्यापक है। ईश्वर अजन्मा, अजर, अमर है, मूर्ति-पूजा निरर्थक है।

एक बार उनके साथ घटी एक घटना के कारण वे मूर्ति-पूजा के प्रबल विरोधी बन गये। दरअसल एक बार शिवरात्रि के पर्व के अवसर पर इन्होने शिवलिंग पर एक चूहे को घूमते हुए देखा, तब से इनका मूर्ति-पूजा से विश्वास उठ गया और तभी से वे मूर्ति-पूजा निरर्थक मानने लगे।