1935 isvi ka bharat shasan adhiniyam

1930 ई० में सविनय अवज्ञा आन्दोलन समाप्त हो चुका था। सरकार ने आश्वासन देकर राष्ट्र-विरोधियों को मौन कर रखा था। इसलिए 1935 ई० में भारतियों को बहुत अधिक आशा थी कि उन्हें ब्रिटिश सरकार अवश्य ही उत्तरदायी शासन प्रदान करेगी। परन्तु वास्तविकता इसके विपरीत थी। प० मदनमोहन मालवीय के अनुसार "यह अधिनियम बाह्य रूप से प्रजातान्त्रिक परन्तु आतंरिक रूप में पूर्ण से खोखला था।"
1935 ई० के अधिनियम की प्रमुख धाराओं और उनके प्रमुख दोषों को संक्षिप्त रूपों से निम्नलिखित संदर्भो में जाना जा सकता है -

1. ब्रिटिश संसद का प्रभुत्व बना रहना - 1935 ई० के अधिनियम में ब्रिटिश संसद का पूर्ण स्वामित्व भारतीय शासन पर बना रहा। भारतीय शासन की समस्त शक्तियाँ और अधिकार अभी भी ब्रिटिश संसद के माध्यम से ब्रिटिश सम्राट को ही प्राप्त थे। भारत-मंत्री ही शासन का सर्वेसर्वा था तथा गवर्नर जनरल (वायसराय) भारत-मंत्री का एजेंट था। यथार्थ में भारत ब्रिटेन का दास ही बना रहा।
2. हास्यास्पद संघीय व्यवस्था - 1935 ई० के एक्ट में केन्द्रीय संघीय व्यवस्था स्थापित करने का प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया। यह बहुत निर्बल संघ बनाया गया। देशी रियासतों को छूट दे दी गयी कि वे चाहें तो संघ में सम्मिलित हो जाएँ और चाहें तो संघ से पृथक रहें। ब्रिटिश प्रान्तों में प्रजातंत्रीय व्यवस्था थी और सम्मिलित होने वाली देशी रियासतों को अपना राजतंत्रीय स्वरूप रखने की छूट दे दी गयी। ऐसी दो असमान इकाइयों को एक स्थान पर मिलाना बहुत ही अव्यवहारिक कार्य था। देशी रियासतों के सम्बन्ध में एक और विषम स्थिति यह थी कि संघ में जनता के प्रतिनिधि नही आने थे, वरन वहाँ के राजाओं के प्रतिनिधि आने थे। यह संघीय व्यवस्था किसी भी रूप में भारतियों को स्वीकार नही था। इसमें गवर्नर जनरल के विशेषाधिकार बने रहे।
3. गवर्नर तथा गवर्नर जनरल को विशेषाधिकार - 1935 ई० के अधिनियम से केंद्र में आंशिक उत्तरदायी शासन और प्रान्तों में पूर्ण उत्तरदायी शासन स्थापित करने की व्यवस्था की गयी। यथार्थ में गवर्नर प्रान्त में पूर्ण स्वामी था और केंद्र में उसका गवर्नर जनरल वैधानिक अधिनायक था। बजट पर गवर्नर तथा गवर्नर जनरल का ही अंतिम अधिकार था। इन्हें ब्रिटिश सरकार के हितो की पूर्ति करने वाले सभी अधिकार प्राप्त थे। यद्यपि कानून और व्यवस्था विभाग उत्तरदायी मंत्रियों को सौंप दिए गये थे, परन्तु वास्तविक शक्तियाँ गवर्नर और गवर्नर जनरल के पास सुरक्षित थीं।
4. असफल द्वैध शासन थोपना - 1935 ई० के अधिनियम से केंद्र पर द्वैध शासन लागू किया गया। 1919 से 1935 ई० तक प्रान्तों में दोहरे शासन का प्रयोग असफल रहा, परन्तु अब यह शासन-पद्धति केंद्र पर लागू की गयी थी। सम्पूर्ण भारत के स्तर पर द्वैध शासन लागू करना कोई व्यावहारिक कार्य नही था।
5. सांप्रदायिक निर्वाचन जारी - 1935 ई० के अधिनियम से भी सांप्रदायिक निर्वाचन और प्रतिनिधित्व को लागू रखा गया था, जबकि राष्ट्रवादी भारतीय 1909 ई० से साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व का विरोध करते आ रहे थे। यह साम्प्रदायिक निर्वाचन सिक्खों, ईसाइयों, हरिजनों और आंग्ल भारतियों पर लागू किया गया।
6. रक्षा-कवचों की दोषपूर्ण प्रणाली - 1935 ई० के अधिनियम में अल्पसंख्यकों और अल्पमतों के लिए अनेक रक्षा-कवच और आरक्षण रखे गये। इस पर कानून बनाने और लागू करने के अधिकार गवर्नर और गवर्नर जनरल के हाथों में सुरक्षित रखे गए। परिणामस्वरूप ये अल्पसंख्यक उच्च वर्ग से अलग होकर अंग्रेजों के पिटठू बन गये।
7. संघीय न्यायालय की स्थापना - 1935 ई० के अधिनियम ने दिल्ली में एक संघीय न्यायालय की स्थापना की, जिसमे एक 1 मुख्य न्यायाधीश तथा अधिक से अधिक 6 न्यायाधीश रखे जाने की व्यवस्था की गयी। संघीय न्यायालय देश का उच्च न्यायालय होते हुए भी सर्वोच्च न्यायालय नही था। वह भारत का सर्वोच्च अपीली न्यायालय भी नही था। बहुत से निर्णयों के सम्बन्ध में प्रिवी कौंसिल में जाना पड़ता था।
8. संशोधन के अधिकार का प्रभाव - 1935 ई० का भारत एक्ट वास्तव में भारत के लिए एक संविधान था, किन्तु इस संविधान में ऐसी स्थिति अवश्य होनी चाहिए थी कि उसमे किसी वैधानिक पद्धति से संशोधन कर लिया जाय, परन्तु इस अधिनियम में ऐसी कोई सुविधा प्रदान नही की गयी कि आवश्यकता पड़ने पर अपेक्षित संशोधन कर लिया जाय। इसलिए यह अधिनियम भारतियों के लिए ठीक नही थी।
9. आत्मनिर्णय का अधिकार शून्य - 1935 ई० के अधिनियम से पूर्व भारतीयों को आशा थी कि उन्हें आत्मनिर्णय का अधिकार प्राप्त होगा, परन्तु ब्रिटिशों का अभी भी यही मत था कि भारतीय उत्तरदायी शासन संभालने में असमर्थ थे। इसलिए इस अधिनियम से भारतियों का आत्मनिर्णय का अधिकार लगभग नगण्य रहा।
10. हास्यास्पद मताधिकार - 1935 ई० के अधिनियम से मताधिकार को व्यापक किया गया, परन्तु अभी भी यह अधिकार दोषयुक्त था। प्रान्तों के विधान-मण्डल में मत देने का अधिकार कुल जनसंख्या के 16% को ही प्रदान किया गया। मताधिकार के सम्बन्ध में शिक्षा और सम्पत्ति को योग्यता का मापदण्ड बनाया गयाअर्थात यह मान लिया गया कि अशिक्षित और सम्पत्तिहीन व्यक्ति को कोई वैधानिक अधिकार नही होना चाहिए। इस प्रकार यह मताधिकार प्रणाली हास्यास्पद थी।
11. बर्मा तथा बरार का पृथक्करण - 1935 ई० के इस अधिनियम से बर्मा क्षेत्र को भारत से पृथक कर दिया गया था। आर्थिक और सांस्कृतिक दृष्टि से यह भारत के लिए बहुत बड़ी क्षति थी, क्योंकि बर्मा बहुत ही उपजाऊ क्षेत्र था।
12. प्रांतीय स्वराज्य पर अवरोध - 1935 ई० के भारत एक्ट से प्रान्तों को स्वराज्य प्रदान किया गया था, परन्तु व्यवहार से इन्हें पूर्ण स्वराज्यीय संस्था नही कहा जा सकता था, क्योंकि गवर्नर जनरल इस एक्ट की धारा 102 के अनुसार संकटकालीन स्थिति की घोषणा कर प्रान्तों के शासन को अपने हाथ में ले सकता था। प्रांतीय विधानमंडल द्वारा पारित बिल भी गवर्नर जनरल की अनुमति के लिए आरक्षित किये जा सकते थे।
13. प्रांतीय मंत्रिमंडल - इस अधिनियम से प्रांतीय स्वशासन कायम करते हुए प्रशासन के सारे विभाग मंत्रियों को दे दिए थे, किन्तु प्रांतीय शासन में मंत्री स्वतन्त्र रूप से बहुत शक्तिहीन थे। मंत्री विधान-मण्डल, गवर्नर और गवर्नर जनरल को इछापर्यंत ही अपने पद पर बने रह सकते थे।
इस तरह इस अधिनियम की उपर्युक्त धाराओं और उनके दोषों से स्पष्ट होता है कि 1935 ई० का एक्ट मात्र एक औपचारिकता थी।