Bharat vibhajan ke pramukh karan
ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली की घोषणा (20 फरवरी, 1946 ई०) से ही भारत विभाजन के चिह्न दृष्टिगोचर होने लगे थे। इस घोषणा में भारत विभाजन या पाकिस्तान निर्माण के स्पष्ट संकेत दिए गए थे। मिस्टर जिन्ना द्वारा संविधान सभा का बहिष्कार और 16 अगस्त, 1946 ई० को 'प्रत्यक्ष कार्यवाही' की घोषणा ने भारत विभाजन को अवश्यम्भावी बना दिया। बहुत से कांग्रेसी नेताओं ने मुसलमानों के प्रत्यक्ष कार्यवाही से भयभीत होकर भारत का विभाजन आवश्यक समझा। परन्तु गाँधी जी ने माउन्टबेटन योजना को स्वीकार नही किया, उन्होंने कहा - "यदि समस्त भारत आग की लपटों से नष्ट हो रहा हो तब भी पाकिस्तान नही बनेगा, पाकिस्तान मेरी लाश पर ही बन सकेगा।" गाँधी जी से बात न बनती देखकर लॉर्ड माउन्टबेटन ने भारत विभाजन और पाकिस्तान निर्माण के लिए प० जवाहरलाल नेहरू तथा सरदार पटेल से बातचीत की। विभाजन के अतिरिक्त अन्य कोई उपाय न होने के कारण विभाजन को स्वीकार कर लिया गया। लेकिन कांग्रेसी नेताओं की सहमति के अतिरिक्त भी कुछ ऐसे कर्ण थे, जिन्होंने भारत विभाजन को अनिवार्य बना दिया। इन कारणों में प्रमुख निम्नलिखित हैं-

Bharat vibhajan ke karan

1. ब्रिटिश शासकों की नीति - भारत विभाजन के लिए ब्रिटिश शासकों की 'फूट डालो और शासन करो' की नीति मुख्य रूप में उत्तरदायी थी। इस नीति का अनुसरण करके उन्होंने भारत के हिन्दुओं और मुसलमानों में साम्प्रदायिकता का विष बो दिया था। इसके अतिरिक्त ब्रिटिश शासकों की सहानुभूति भी पाकिस्तान के साथ थी। शायद इसीलिए वायसराय लार्ड वेवल के संवैधानिक परामर्शदाता वी० पी० मेनन ने सरदार पटेल से कहा, "गृह युद्ध की ओर बढ़ने के बजाय देश का विभाजन स्वीकार कर लेना अच्छा है।" लार्ड वेवल ने अन्तरिम सरकार में भी मुस्लिम लीग को कांग्रेस के विरुद्ध कर दिया था।

2. मुस्लिम लीग को प्रोत्साहन - ब्रिटिश सरकार आरम्भ से ही कांग्रेस के विरुद्ध रही, क्योंकि कांग्रेस ने अपनी स्थापना के बाद से ही सरकार की आलोचना करनी शुरू कर दी थी और सरकार के सामने ऐसी माँगे रख दी थी, जिन्हें सरकार स्वीकार करने के लिए तत्पर नही थी। इसलिए सरकार ने मुस्लिम लीग को प्रोत्साहन देने के लिए 1909 ई० के अधिनियम में मुसलमानों को साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व प्रदान किया और आगे भी वह मुसलमानों को कांग्रेस के विरुद्ध भड़काती रही।

3. कांग्रेस की दोषपूर्ण नीति - कांग्रेस ने 1916 ई० में मुस्लिम लीग के साथ लखनऊ समझौता किया, जो कि कांग्रेस की एक बड़ी भूल थी। अनजाने में ही कांग्रेस ने इसी समझौते के द्वारा पाकिस्तान की नींव रख दी, क्योंकि कांग्रेस ने मुसलमानों के साम्प्रदायिक निर्वाचन क्षेत्र के सिद्धान्त को स्वीकार कर लिया था। इसी प्रकार सी० आर० फ़ॉर्मूले में भी मुस्लिम लीग की पाकिस्तान की माँग एक बड़ी सीमा तक स्वीकार कर ली गयी थी। कांग्रेस की इसी नीति के कारण जिन्ना की धारणा थी कि अंत में कांग्रेस की परिस्थिति से मजबूर होकर इसे स्वीकार करना ही होगा।

4. जिन्ना की जिद - जिन्ना प्रारम्भ से ही द्वी-राष्ट्र सिद्धान्त के समर्थक थे। पहले वे बंगाल और सम्पूर्ण असम को पाकिस्तान में मिलाना चाहते थे तथा पश्चिम पाकिस्तान में समस्त पंजाब, उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रान्त, सिंध और बलूचिस्तान को मिलाना चाहता थे। अपनी जिद के कारण जिन्ना ने 1940 से 1947 ई० तक निरन्तर गतिरोध बनाये रखा और समस्याओं के निराकरण के लिए बनायी गयी सभी योजनाओं को अस्वीकार कर दिया। परन्तु 3 जून, 1947 ई० की योजना में उन्हें दिया गया पाकिस्तान उस पाकिस्तान से अच्छा नही था, जिसे उन्होंने 1944 ई० में अपूर्ण, अंगहीन तथा दीमक लगा पाकिस्तान कहकर अस्वीकार कर दिया था। अब जो पाकिस्तान उनको दिया गया, वह उनकी आशाओं से बहुत छोटा था, जिसे जिन्ना ने लार्ड माउंटबेटन के दबाव के कारण स्वीकार कर लिया था।

5. सांप्रदायिक दंगे - जिन्ना के प्रत्यक्ष कार्यवाही की नीति के कारण भारत के कई भागों में हिन्दू-मुस्लिमों के बीच दंगे-फसाद हो रहे थे, जिनमे हजारों की संख्या में निर्दोष लोग मारे जा रहे थे और अपार धन-सम्पत्ति नष्ट हो रही थी। कांग्रेसी नेताओं में इन दंगो को रोकने के लिए भारत का विभाजन स्वीकार करना ही उचित समझा।

6. भारत को शक्तिशाली बनाने की इच्छा - कांग्रेसी नेता इस बात का अनुभव कर रहे थे कि विभाजन के बाद भारत बिना किसी बाधा के चहुँमुखी उन्नति कर सकेगा, अन्यथा भारत सदैव गृह-संघर्ष में ही फसा रहेगा। 3 जून, 1947 ई० को प० जवाहरलाल नेहरू ने विभाजन को स्वीकार करने के लिए जनता से अपील करते हुए कहा था, "कई पीढ़ियों से हमने स्वतन्त्र व संयुक्त भारत के लिए संघर्ष किया तथा स्वप्न देखे हैं, इसलिए उस देश के विभाजन का विचार भी बहुत कष्टदायक है, परन्तु फिर भी मेरा दृढ़ विश्वास है कि हमारा वर्तमान निर्णय सही है। यह समझना आवश्यक है कि तलवारों द्वारा भी अनैच्छिक प्रान्तों को भारतीय संघ राज्य में रख सकना सम्भव नही है। यदि उन्हें जबरन भारतीय संघ में रखा भी जा सके तो कोई प्रगति और नियोजन सम्भव न होंगे। राष्ट्र में संघर्ष और परष्पर झगड़ों के जारी रहने से देश की प्रगति रुक जाएगी। भोली जनता के कत्ल से तो विभाजन ही अच्छा है।" इससे स्पष्ट है कि कांग्रेस ने परिस्थितियों की मजबूरी के कारण ही भारत के विभाजन को स्वीकार किया था। प० जवाहरलाल नेहरू ने लिखा है, "हालात की मजबूरी थी और यह अनुभव किया गया कि हम जिस मार्ग पर चल रहे हैं, उसके द्वारा गतिरोध को हल नही किया जा सकता; अतः हमको देश का विभाजन स्वीकार करना पड़ा।"

7. हिन्दू महासभा का प्रभाव - हिन्दू महासभा की हिन्दू साम्प्रदायिकता ने भी भारत विभाजन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। प्रारंभ में हिन्दू महासभा ने कांग्रेस को हर प्रकार का सहयोग दिया, किन्तु 1930 ई० के उपरांत हिन्दू महासभा पर प्रतिक्रियावादी तत्वों का प्रभुत्व स्थापित हो गया। हिन्दू महासभा के अधिवेशन में भाषण देते हुए श्री सावरकर ने स्पष्ट रूप से कहा, "भारत एक और एक सूत्र में बंधा राष्ट्र नही माना जा सकता अपितु यहाँ दो राष्ट्र हैं - हिन्दू और मुसलमान। भविष्य में हमारी राजनीति विशुद्ध हिन्दू राजनीति होगी।" इस प्रकार हिन्दू सम्प्रदायवाद ने भी मुसलमानों को पाकिस्तान बनाने के लिए प्रेरित किया।

8. भारतियों को सत्ता देने में सरकार का रुख - 1929 ई० से 1945 ई० की अवधि में ब्रिटिश सरकार और भारतियों के सम्बन्धो में काफी कटुता आ गयी थी। ब्रिटिश सरकार यह अनुभव करने लगी थी कि भारत स्वाधीनता प्राप्ति के बाद ब्रिटिश राष्ट्रमण्डल का सदस्य कदापि नही रहेगा। इसलिए उसने विचार किया कि यदि स्वतन्त्र भारत अमैत्रीपूर्ण है तो उसे निर्बल बना देना ही उचित है। पाकिस्तान का निर्माण अखण्ड भारत को विभाजित कर देगा और कालांतर में भारत भारत उपमहाद्वीप में ये दोनों देश आपस में लड़कर अपनी शक्ति को क्षीण करते रहेंगे। ब्रिटिश सरकार की यह सोंच आज सत्य हो रही है।

9. भारत के विभाजन के स्थायीकरण में संदेह - अनेक राष्ट्रीय नेताओं को भारत के विभाजन के स्थायी रहने में संदेह था, उनका कहना था कि भौगोलिक, राजनीतिक, आर्थिक और सैनिक दृष्टिकोण से पाकिस्तान एक स्थायी राज्य नही हो सकता और आज अलग होने वाले क्षेत्र कभी न कभी फिर भारतीय संघ में सम्मिलित हो जायेंगे। कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष आचार्य कृपलानी ने भी कहा था, "भारत की एकता का कार्य भारत को मजबूत, सुखी, गणतंत्रात्मक और समाजवादी राज्य बनाकर किया जा सकता है। भारत की एकता के बिना उसकी स्वतंत्रता अधूरी रहेगी।" इस प्रकार भारत के विभाजन को अस्थायी समझकर राष्ट्रीय नेताओं ने पाकिस्तान के निर्माण को स्वीकार कर लिया।

10. कांग्रेसी नेताओं का सत्ता के प्रति आकर्षण - माइकल ब्रेचार ने लिखा है, "कांग्रेसी नेताओं के समक्ष सत्ता के प्रति आकर्षण भी था। इन नेताओं ने अपने राजनीतिक जीवन का अधिकांश भाग ब्रिटिश शासन के विरोध में ही बिताया था और अब वे स्वाभाविक रूप से सत्ता के प्रति आकर्षित हो रहे थे। कांग्रेसी नेता सत्ता का रसास्वादन कर चुके थे और विजय की घडी में इससे अलग होने इच्छुक नही थे।

11. लॉर्ड माउन्टबेटन का प्रभाव - भारत विभाजन के लिए लॉर्ड माउन्टबेटन का व्यक्तिगत प्रभाव भी उत्तरदायी था। उन्होंने कांग्रेसी नेताओं को भारत विभाजन के प्रति तटष्ठ कर दिया था। मौलाना आजाद ने लिखा है, "लॉर्ड माउन्टबेटन के भारत आने के एक माह के अन्दर पाकिस्तान के प्रबल विरोधी नेहरू विभाजन के समर्थक नही तो कम से कम इसके प्रति तटष्ठ अवश्य हो गए।