विनिमय की परिभाषा - विनिमय का सामान्य अर्थ वस्तुओं की अदल-बदल से लगाया जाता है। अर्थशास्त्र में धन, वस्तुओं तथा सेवाओं के पारस्परिक आदान-प्रदान को विनिमय की संज्ञा दी गयी है।
विभिन्न अर्थशास्त्रयों ने विनिमय को निम्नवत परिभाषित किया है -
1. प्रोफेसर मार्शल के अनुसार दो पक्षों के मध्य होने वाले ऐच्छिक, वैधानिक एवं पारस्परिक धन के हस्तांतरण को विनिमय कहते हैं।
2. प्रोफेसर जेवेन्स के अनुसार कम आवश्यक वस्तुओं से अधिक आवश्यक वस्तुओं की अदल-बदल को ही विनिमय कहते हैं।
विनिमय से लाभ -
विनिमय आधुनिक अर्थव्यवस्था की आधारशिला है। इसी से इसका महत्व समझा जा सकता है। विनिमय क्रिया में निम्नलिखित लाभ होते हैं -
1. विनयम से दोनो पक्षों को लाभ होता है - विनिमय में एक पक्ष कम आवश्यक वस्तु देकर अधिक आवश्यक वस्तु स्वीकार करता है। इस प्रकार इससे दोनों ही पक्ष लाभान्वित होते हैं।
2. आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धि - विनिमय के माध्यम से आवश्यक वस्तुएं सुलभ हो जाती हैं। यह आयात निर्यात को जन्म देता है। एक राष्ट्र अपनी आवश्यकता की वस्तुएं दूसरे राष्ट्र से आयात कर लेता है।
3. प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग - विनिमय के कारण राष्ट्र अपने प्राकृतिक संसाधनों का समुचित दोहन कर सकता है। नई-नई वस्तुओं के निर्माण तथा उत्पादन के विशिष्टीकरण के कारण राष्ट्र अपने प्राकृतिक संसाधनों के अधिकतम उपयोग में सफल हो जाता है।
4. बड़े पैमाने का उत्पादन - विनिमय के माध्यम से सेवाएँ, कच्चे माल तथा मशीने भी उपलब्ध हो जाती हैं। इससे उत्पादक वस्तुओं का उत्पादन बड़े पैमाने पर करने में सफल हो जाता है। बड़े पैमाने के उत्पादन द्वारा ही देश और विदेश की माँग और पूर्ति की जा सकती है।
5. बाजार का विस्तार - विनिमय के फलस्वरूप बड़े पैमाने पर उत्पादन सम्भव हो जाता है , जिसके कारण वस्तु उत्पादन लागत कम हो जाती है और वस्तुओं का मूल्य कम हो जाने से उनका बाजार विस्तृत हो जाता है।
विनिमय से हानियाँ
विनिमय आधुनिक अर्थव्यवस्था का वरदान है लेकिन फिर भी समाज को विनिमय से निम्नलिखित हानियाँ होती हैं-
1. प्राकृतिक संसाधनों का अनुचित शोषण - कभी-कभी विनिमय के द्वारा एक सबल राष्ट्र निर्बल राष्ट्र के प्राकृतिक संसाधनों का अपने हित मे अनुचित शोषण करने लगता है। जैसे ग्रेट ब्रिटेन ने भारत के प्राकृतिक साधनों का अपने हित मे प्रयोग किया था। इससे देश की हानि होती है।
2. राजनीतिक दासता - विनिमय की क्रियाओं के द्वारा सबल राष्ट्र कमजोर राष्ट्रों को गुलाम बना लेता है। अंग्रेजो ने भारत को व्यापार-विनिमय के द्वारा ही गुलाम बनाया था।
3. आर्थिक निर्भरता - विनिमय के कारण एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र पर आर्थिक रूप से निर्भर हो जाता है। यह आर्थिक निर्भरता युद्धकाल एवं संकटकाल में अधिक घातक सिद्ध होती है। ऐसे समय में वे एक-दूसरे देश को वस्तुएँ भेजना बन्द कर देते हैं।
4. युद्ध की आशंका - विनिमय के कारण शक्तिशाली राष्ट्रों में बाजार की प्राप्ति के लिए होड़ लग जाती है, जिससे इनमे ईर्ष्या, द्वेष तथा अनुचित प्रतियोगिता उत्पन्न हो जाती है। फलतः युद्ध हों होने का खतरा उत्पन्न हो जाता है।