Market definition and market classification

साधारण बोलचाल की भाषा में 'बाजार' शब्द से बोध उस स्थान से होता है। जहाँ वस्तुओं के क्रेता और विक्रेता दोनों परस्पर सौदा करने के लिए एकत्र होते हैं, किन्तु अर्थशास्त्र में बाजार किसी किसी विशेष स्थान तक सीमित नही है बल्कि उस पूरे क्षेत्र से सम्बन्ध रखता है, जहाँ क्रेता विक्रेता आपस में मिलते हैं अथवा सम्बन्ध स्थापित करते है। उनका यह सम्बन्ध भौतिक रूप में हो सकता है अथवा संचार के विभिन्न साधनों, जैसे - टेलेफोन, इन्टरनेट, ईमेल, व्यावसायिक मेल, फैक्स मध्यस्थों आदि द्वारा हो सकता है।

Sabji Market

विभिन्न अर्थशास्त्रियों द्वारा दिये गये बाजार की परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं -
1. सिजविक (Sidgwick) के अनुसार - बाजार मनुष्यों का ऐसा समूह है जिसमें इस प्रकार के वाणिज्य सम्बन्ध स्थापित हुए हों कि प्रत्येक को सुगमतापूर्वक यह पता चल जाय कि अन्य व्यक्ति समय-समय पर कुछ वस्तुओं और सेवाओं का विनिमय किन कीमतों पर करते हैं।
2. कूर्नो (Cournot) के अनुसार - बाजार कोई ऐसा विशेष स्थान नही है जहाँ वस्तुओं का क्रय विक्रय होता हो, वरन ऐसा क्षेत्र है जिसमे विक्रेताओं और ग्राहकों के मध्य परस्पर स्वतन्त्र सम्पर्क हों कि वस्तु की कीमतों में सुगमता तथा शीघ्रता से समानता होने की प्रवृत्ति उत्पन्न हो जाय।
3. ऐली (Ely) के अनुसार - बाजार का अर्थ हम उस साधारण क्षेत्र से लगाते हैं जिसके भीतर किसी वस्तु-विशेष की कीमतों का निर्धारण करने वाली शक्तियाँ कार्यशील हैं।
4. जेवन्स (Jevons) के अनुसार - बाजार शब्द से तात्पर्य व्यक्तियों के समूह से है जिसमे व्यापारिक सम्बन्ध होते हैं और किसी वस्तु में मिश्रित व्यवसाय करते है।

समय के आधार पर बाजार का वर्गीकरण
1. दैनिक बाजार - जिस बाजार में वस्तु की पूर्ति निश्चित रहती है तथा मूल्य निर्धारण में पूर्ति की अपेक्षा माँग का अधिक प्रभाव रहता है,ल 'दैनिक बाजार' कहलाता है।
2. अल्पकालीन बाजार - जब किसी वस्तु की माँग बढ़ने पर उसकी पूर्ति बढ़ने के लिए समय नही मिल पाता तो उसे 'अल्पकालीन बाजार' कहते हैं।
3. दीर्घकालीन बाजार - जब किसी वस्तु की माँग बढ़ने पर उत्पादन को बढ़ाकर पूर्ति बढ़ाने का समय मिल जाता है तो उसे 'दीर्घकालीन' बाजार कहते हैं।
4. अति दीर्घकालीन बाजार - जब उत्पादक को इतना समय मिल जाता है कि वह उपभोक्ता के स्वभाव, फैशन और रूचि के अनुसार वस्तुओं का उत्पादन कर सकता है तो उसे 'अति दीर्घकालीन बाजार' कहते हैं।

क्षेत्र के आधार पर बाजार का वर्गीकरण
1. स्थानीय बाजार - जब किसी वस्तु का क्रय तथा विक्रय किसी एक क्षेत्र तक सीमित बना रहता है तो उसे 'स्थानीय बाजार' कहते हैं।
2. प्रादेशिक बाजार - जब किसी वस्तु के क्रेता और विक्रेता पूरे प्रदेश में फैले होते हैं तो उसे 'प्रादेशिक बाजार' कहते हैं।
3. राष्ट्रीय बाजार - जब किसी वस्तु के क्रेता और विक्रेता पूरे देश में फैले होते हैं तो उसे 'राष्ट्रीय बाजार' कहते है।
4. अंतर्राष्ट्रीय बाजार - जब किसी वस्तु के क्रेता और विक्रेता समूचे विश्व में फैले होते हैं तो उसे 'अंतर्राष्ट्रीय बाजार' कहते हैं।

प्रतियोगिता के आधार पर बाजार का वर्गीकरण
1. पूर्ण बाजार - पूर्ण बाजार वह है जिसमे क्रेता और विक्रेता बड़ी संख्या में होते हैं। उन्हें बाजार का पूर्ण ज्ञान होता है तथा उनमे पूर्ण प्रतियोगिता पायी जाती है जिसके कारण वस्तु का मूल्य एक ही रहता है। यह एक काल्पनिक बाजार है तथा व्यवहार में नही पाया जाता।
2. अपूर्ण बाजार - अपूर्ण बाजार में पूर्ण प्रतियोगिता बाजार का आभाव पाया जाता है। क्रेताओं तथा विक्रेताओं की संख्या अपेक्षाकृत कम होती है। उन्हें बाजार का पूर्ण ज्ञान नही होता तथा बाजार में वस्तु-विभेद एवं गैर-कीमत प्रतियोगिता पायी जाती है। इनमे वस्तुओं का मूल्य भी एक समय पर एक नही होता है।
3. एकाधिकार - यह प्रतियोगिता रहित बाजार होता है। इसमें वस्तु का केवल एक ही उत्पादक या विक्रेता होता है। एकाधिकार का अपनी वस्तु की कीमत तथा पूर्ति पर पूर्ण नियंत्रण रहता है। वह ऐसी वस्तु का उत्पादन करता है जिसकी स्थानापन्न वस्तु उपलब्ध नही होती। ऐसी वस्तु की माँग की आड़ी लोच शून्य होती है।