लॉर्ड एमहर्स्ट के स्वदेश लौट जाने के बाद 1828 ई० में लॉर्ड विलियम बैंटिक भारत का गवर्नर जनरल बना। बैंटिक ने अपने 7 साल के कार्यकाल में अनेक सुधार-कार्य किया। भारत का गवर्नर जनरल बनने से पहले 1803 ई० में बैंटिक मद्रास (चेन्नई) का गवर्नर रह चुका था, इसलिए उसे भारतीय शासन का पूरा अनुभव था। बैंटिक उदारवादी विचार का था, इसलिए वह भारत के शासन में आपेक्षित सुधार लाना चाहता था।

बैंटिक के द्वारा किये गए प्रशासकीय सुधार निम्नलिखित हैं।
1. नियुक्तियों में सुधार - अब तक चली आ रही व्यवस्था के अनुसार भारतीय उच्च पदों पर नियुक्त नही हो सकते थे। बैंटिक ने यह नियम बना दिया कि अब धर्म, जाती, जन्म, वंश या रंग के आधार पर किसी भी व्यक्ति को कम्पनी की सेवाओं से वंचित नही किया जाएगा। इस प्रकार योग्यता के आधार पर सभी पद भारतीयों की नियुक्ति के लिए भी खुल गए।

2. न्याय-व्यवस्था में सुधार - न्याय और दंड व्यवस्था में सुधार के लिए विलियम बैंटिक ने अनेक महत्वपूर्ण कार्य किये बैंटिक ने निष्प्रभावी न्यायालयों को समाप्त करने की नीती अपनायी। इस नीति के अंतर्गत प्रांतीय अपीलों तथा दौरे के न्यायालय समाप्त कर दिए गए।
कलकत्ता में सुप्रीम कोर्ट में दीवानी और फौजदारी मुकदमों की अपील होती थी। इसके साथ-साथ पश्चिमी क्षेत्र की जनता की सुविधा के लिए आगरा में अपील की अदालत स्थापित की गयी।
इलाहाबाद में एक सदर दीवानी अदालत और एक सदर निजामत अदालत की स्थापना की गयी। भारतीय न्यायाधीशों की संख्या बढ़ा दी गई तथा उनके वेतन में अभिवृद्धि की गयी।
इलाहाबाद में एक 'बोर्ड ऑफ़ रेवेन्यू' की भी स्थापना की गयी। कई जिलों के ऊपर कमिश्नर की नियुक्ति भी की जाती थी। बैंटिक ने न्यायालयों में स्थानीय भाषा के प्रयोग का भी प्रचलन किया। विलियम बैंटिक ने दंड प्रक्रिया को भी सरल बनाया।