आतंकवाद रूपी जहर मौजूदा दौर में समूचे विश्व को प्रभावित कर रहा है | विश्व के लगभग हरेक देश कहीं न कहीं इससे प्रताड़ित है | चाहे विकासशील देश हो या चाहे वह मजबूत अर्थव्यवस्था वाला विकसित देश हो सभी इस व्यापक समस्या से परेशान हैं | दुनिया भर के बुद्धिजीवियों को इस बात को सोंचने पर मजबूर कर रहा है कि कैसे इस विकराल समस्या से निपटा जाये |

जैसा कि हमने लेख के शीर्षक को दो शब्दों से मिलाकर "आतंकवाद और फंडिंग" से बनाया है से यह प्रतीत होता है कि कहीं न कहीं ये दोनों शब्द आपस में जुड़े हुए हैं | इस तात्पर्य से देखा जाय तो फंड आतंकवाद का पूरक है | मतलब फंडिंग है तो आतंकवाद है | यानी आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए फंडिंग की जाती है | परन्तु यह बात एक अपच भोज्य पदार्थ की तरह है मतलब साफ शब्दों में कहें तो आतंकवाद सिर्फ एक दिखावा है, यह सिर्फ पैसा कमाने का एक रास्ता है, और कुछ नही | हालाँकि इस बात को भी नाकारा नही जा सकता है कि कुछ संगठने और कुछ घटनाएँ मनगढ़ंत विचारधाराओं की वजह से हुई हैं | जिनमे से इस्लामिक स्टेट संगठन और और फ़्रांस में चार्ली हेब्दो के दफ्तर में हुआ आतंकी हमला प्रमुख है | परन्तु इन सबसे परे देखा जाय तो कुछ और ही नजर आता है |

अब हम यह सोचने पर मजबूर हो रहे हैं कि आतंकवाद से किसको फायदा है, किसी देश को या किसी धर्म/मजहब को नही यह दोनों तो मानवता के पूरक हैं, तो फिर आतंकवाद से किसी देश, किसी धर्म/मजहब को कैसे लाभ पहुँच सकता है | वास्तव में यह सब खेल है, जो स्वार्थ से पूर्णित है |

हालाँकि कि आतंकवाद की यह परिभाषा दी जाती है, कि अपने आर्थिक, धार्मिक, राजनीतिक और विचारात्मक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए गैर-सैनिक अर्थात सामान्य नागरिकों की सुरक्षा को निशाना बनाते हुए किये गए हमले को "आतंकवाद" कहा जाता है| इस परिभाषा से आतंकवाद को देखा जाय तो इस प्रकार का कोई भी लक्ष्य उसे अब तक प्राप्त नही हुआ है| वरन आतंकवाद को हमेशा मुह की खानी पड़ी है | फिर भी इसका अस्तित्व बरकरार है | अब इन बातों को स्पष्ट रूप से समझिये | परिभाषा के दृष्टि से देखा जाय तो आतंकवाद थोड़ा सा भी अपने लक्ष्य की और अग्रसर नही है | फिर भी इसे किसी संगठन या देश के माध्यम से निरंतर बढ़ावा दिया जा रहा है | उदहारण के तौर पर देखा जाय तो यदि किसी कम्पनी को निरंतर घाटा हो रहा हो और उसका मालिक फिर भी उस कम्पनी को चला रहा हो तो यह अजीब लगता है न |

अब आतंकवाद की परिभाषा पर मत जाइये यह एक ऐसा शब्द है जिसको हमे एक नये नजरिये से देखना चाहिए मतलब कम्पनी घाटे में नही चल रही है यानि आतंकवाद अपने लक्ष्य की और दिन दूनी और रात चौगनी प्रगति कर रही है, अब अप कहेंगे कि कैसे ?

यही तो वह खेल है जिससे कुछ लोग आर्थिक, धार्मिक, राजनीतिक और विचारात्मक रूपी आतंकवाद के चादर से ढक कर अपनी रोटियाँ सेक रहे हैं | जिसमे मुख्या रूप से संगठन के प्रमुख, राजनीति से सम्बन्ध रखने वाले लोग और हथियार सप्लाई करने वाले तक लोग शामिल हैं | अब सोचो कि इस खेल के खिलाड़ियों के घर की रोटियाँ कैसे पकती होंगी |

दरअसल यह सब खेल फंड के फंडा का है यानि फंड को इकट्ठा करने वाले निचले स्तर से लेकर संगठन के आकाओं तक सभी उसी फंड से मलाई खा रहे हैं जिसे आतंकवाद के नाम पर इकट्ठा किया जाता है | उदहारण के तौर पर टॉप 10 आतंकवादी संगठनो की सूची में से अलकायदा संगठन का संस्थापक ओसामा बिन लादेन जिसने अमेरिका में 26/11 का हमला कराया था के ऐसोआराम के लिए पैसे कहाँ से आते थे कैसे चलता था इतना बड़ा संगठन किन पैसों से खरीदता था हथियार | स्पष्ट है कि इसके लिए फंडिंग होती है | फंडिंग के कार्य को करने के लिए इसमें छोटे स्तर से लेकर बड़े स्तर तक के लोग होते होंगे जिनकी जिन्दगी बड़े आराम से कट रही है सीधी सी बात है यदि किसी ने आतंकवाद के नाम पर 100 रूपये का फंड इकट्ठा किया तो 100 रूपये में से कम से कम 1 रुपया तो जरूर अपने लिए रखता होगा और यह प्रोसेस तब तक चलता है जब कि वह पैसा अपने ठिकाने तक नही पहुँच जाता है |

इन सब बातों से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि आतंकवाद के आड़ में फंडिंग का खेल जोरो पर चल रहा है | भले ही वे अपने दिखावे रूपी विचारात्मक सोंच की प्राप्ति न कर सके लेकिन वे तो अपने घर की रोटियाँ सेकने में कामयाब हो ही रहे हैं |

लेखक- राजेन्द्र कुमार