नमस्कार! मेरा नाम राम कृपाल है । मै यू.पी. के एक छोटे से गाँव का निवासी हूँ । पेशे से मै किसान हूँ । मेरे परिवार में मेरे पिता जी, मेरी माँ, मेरी पत्नी, और मै रहता हूँ । कुछ दिनों पहले मेरे साथ एक घटना घटी । मेरा 10 वर्षीय पुत्र बहुत बीमार हो गया । पहले तो मैंने गाँव के डॉक्टर को दिखाया पर कोई फायदा ना होने पर गाँव से कुछ किलोमीटर दूर स्थित कस्बे के एक अस्पताल में अपने बेटे को भर्ती कराया । डॉक्टर ने कुछ टेस्ट कराये जिसके रिपोर्ट शाम तक आ गये । रिपोर्ट से पता चला कि मेरे बेटे को कैंसर हुआ है । मुझे ऐसा लगा कि मेरे पैरों तले जमीन खिसक गयी । डॉक्टर ने मुझे सलाह दिया कि शहर के सरकारी अस्पताल में अपने बेटे का इलाज कराओ ।

अगले दिन सुबह ही मै और मेरी पत्नी अपने बेटे के साथ शहर चल दिए । दोपहर तक हम अस्पताल पहुँच गए । अस्पताल पहुँचने के बाद पहले दिन यह कहकर भर्ती नहीं किया गया कि अभी अस्पताल में बेड खाली नहीं है । अगले दिन सुबह जब मै काउंटर पर गया तो एक आदमी ने कहा कि 500 रूपये लाओ तो तुम्हारे बेटे को किसी तरीके से भर्ती करा दूंगा नहीं तो आप इसी तरह परेशान होते रहेंगे । मुझे अपने बेटे का जल्दी इलाज कराना था इसलिए मजबूरी में मैंने रूपये दे दिए । रूपये देने के कुछ छण बाद ही मेरे बेटे को भर्ती कर लिया गया ।

दोपहर बाद डॉक्टर साहब मेरे बेटे को देखने आये और उन्होंने कुछ दवाइयाँ लिखकर दी और कहा जितनी जल्दी इन दवाओं को लेकर आओगे उतनी ही जल्दी तुम्हारे बेटे का इलाज शुरू हो जायेगा । मै पर्ची लेकर दवाखाना की तरफ दौड़ा फार्मासिस्ट को पर्ची दिया । फार्मासिस्ट ने कुछ देर पर्ची देखने के बाद कहा चाचा जी ये दवायें यहाँ नहीं मिलती आप सड़क उस पार दो दुकान छोड़कर तीसरी दुकान पर जाइये वहीँ पर ये दवायें मिलेंगी ।

मै गेट से बाहर निकलकर सड़क उस पार नजर दौड़ाते ही देखा कि तीसरी दुकान से एक आदमी बाहर निकलकर हाथ हिलाकर मुझे बुला रहा है । मै अचंभित रह गया कि इन सज्जन को कैसे पता चला कि मै दवाइयाँ लेने जा रहा हूँ । मेरे चेहरे के भाव को देखकर पास खड़े एक सज्जन ने इशारे में कहा ये सब अन्दर और बाहर कि सांठ-गांठ है । पर उसके बातों को सुनने के लिए मेरे समय कहाँ । मै दवाखाना से दवाइयाँ खरीदकर अस्पताल में पहुंचा तो डॉक्टर साहब ने इलाज करना शुरू किया ।

अब मेरे पास पैसे भी कम बचे थे और शाम को कुछ और दवाइयाँ खरीदनी थी । इसलिए पैसे का इंतजाम करने के लिए मै घर को चल दिया । गाँव पहुंचकर पैसों का इंतजाम करके जल्दी ही अस्पताल को चल दिया । शाम तक अस्पताल पहुँच गया । अस्पताल पहुँचने पर मेरी पत्नी ने बताया कि आपने जो इंजेक्शन दुकान से लाये थे कम्पाउण्डर ने उसके बदले दूसरा इंजेक्शन लगाया और कहा कि डॉक्टर साहब उस इंजेक्शन के बदले इस इंजेक्शन को लगाने के लिए कहा था दुकान वाली इंजेक्शन को अपने साथ लेकर चला गया । बगल के बेड के तीमारदार ने कहा कि भईया जब भी इंजेक्शन लगवायें अपने सामने ही लगवाये नही तो भईया इंजेक्शन के बदले पानी लगा देते हैं । मुझे यह सुनकर बहुत आश्चर्य हुआ ।

लगभग 5 दिन बीत जाने के बाद भी मेरे बेटे के स्वास्थ्य में कोई सुधार नहीं हुआ बल्कि स्वास्थ्य और बिगड़ता ही जा रहा था । 5वें  दिन डॉक्टर साहब ने कहा आपके बेटे के स्वास्थ्य में कोई सुधार नहीं हो रहा है आपके लड़के को स्पेशल ट्रीटमेंट कि आवश्यकता है जो इस सरकारी अस्पताल में उपलब्ध नही है । जब मैंने पूछा कि किस तरह कि स्पेशल ट्रीटमेंट तो डॉक्टर साहब ने कहा घबराने कि जरूरत नही है बस आप कुछ रुपयों कि व्यवस्था और करो हम स्पेशल ट्रीटमेंट यहीं उपलब्ध करा देंगे । डॉक्टर साहब के कहे अनुसार रूपये हमने तो दे दिए लेकिन डॉक्टर साहब कि स्पेशल ट्रीटमेंट भी मेरे बेटे को नही बचा सकी । मै अपने बेटे के लिए दुखी तो हो गया परन्तु उससे कहीं ज्यादा चिंतित हो गया अपने देश के लिए ।

दरअसल कैंसर मेरे बेटे के शरीर में नही फैली थी बल्कि कैंसर अपने देश में रिश्वत, धोखाधड़ी, बेईमानी के रूप में फैली हुई है । जिसे समय रहते काबू नहीं किया गया तो यह अपने अंतिम स्टेज पर पहुँच जाएगी फिर कोई भी स्पेशल ट्रीटमेंट काम नहीं आएगी । आज जहाँ भी देखो हर गली, हर चौराहे पर रिश्वत रूपी कैंसर अपने देश को जकड़ती जा रही है । बच्चा पैदा होने पर रिश्वत, बच्चे का स्कूल में एडमिशन लेने के लिए रिश्वत, नौकरी पाने के लिए रिश्वत, तनख्वाह लेने के लिए रिश्वत, पेंसन पाने के लिए रिश्वत, 10 रूपये से लेकर 10 करोड़ रूपये तक रिश्वत । चपरासी से लेकर बड़े-बड़े अफसरों नेताओं को रिश्वत रूपी कैंसर अपने चपेट में ले लिया है । आज ऐसा कोई भी विभाग नही है जो, इस कैंसर से ग्रस्त ना हो ।

इस कैंसर के इलाज के लिए ना ही किसी बड़े अस्पताल कि आवश्यकता है ना ही किसी बड़े डॉक्टर की । जरूरत है तो हमे " चाहे वह चपरासी हो या अफसर या फिर नेता हो, चाहे हम आम हों या ख़ास " सिर्फ उस संकल्प का पूरी निजता और निष्ठा से निर्वाह करने की जो हमने पद प्रतिष्ठा को ग्रहण करते वक्त ली थी ।


लेखक - राजेंद्र कुमार