फ्रांस की क्रांति । फ्रांस की क्रांति के कारण । फ्रांस के क्रांति के प्रमुख घटनाएं। France ki kranti

फ्रांस की क्रांति सन् 14 जुलाई 1789 ई० को बास्तील की घटना से शुरू हुआ। फ्रांस का एक वर्ग पादरियों, सामन्तों और उच्च पदों के अधिकारियों जो वैभव एवं विलासितापूर्ण जीवन व्यतीत करते थे, वहीं साधारण वर्ग की दशा बदहाल थी। राजा की निरंकुशता, दुर्व्यवस्था एवं कुशासन से फ्रांस की साधारण जनता ऊब चुकी थी। जिसके परिणाम स्वरूप 1789 ई० को फ्रांस में भीषण जन-विद्रोह हुआ और फ्रांस के तत्कालीन राजा 'लुई सोलहवाँ' एवं रानी 'मेरी अन्तोआंत' के मौत के घाट उतार दिए। यह क्रांति 18 जून 1815 ई० को वाटर लू के युद्ध के साथ समाप्त हुआ। इस क्रांति के फलस्वरूप यहाँ के निरंकुश राजतन्त्र का अंत हुआ और फ्रांस में लोकतन्त्र की स्थापना हुई।

("फ्रांस की क्रांति विश्व के इतिहास की महानतम घटनाओं में से एक थी, जिसने संसार को स्वतन्त्रता, समानता और बन्धुत्व का सन्देश दिया।") - गूच

फ्रांस की क्रांति के कारण

फ्रांस की अव्यस्थित राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक दशा के कारण फ्रांस की क्रांति की शुरुआत हुई। फ्रांस के क्रांति के निम्नलिखित कारण थे।
1. राजनीतिक कारण - राजा की निरंकुशता, अयोग्यता, एवं अव्यवस्थित शासन से फ्रांस की जनता त्रस्त थी। जन-साधारण की ओर ध्यान न देकर राजा अपने शान-शौकत के राजकोष का दुरूपयोग करते थे। धनी, पादरी, सामन्त एवं उच्च अधिकारी राजकीय करों से मुक्त थे, वहीं निम्न वर्ग करों के बोझ से दबी थी। फलतः फ्रांस की जनता ने क्रांति का विगुल बज दिया।
2. आर्थिक कारण - इंग्लैंड के साथ लगातार युद्ध होने के कारण राजकोष खाली होता जा रहा था। और राजघराने के सदस्य विलासिता के लिए धन पानी के तरह बहा रहे थे जिससे राजकोष पर बुरा असर पड़ा। विदेशी कर्ज बढ़ता जा रहा था। जिसकी पूर्ति के किसानो और मजदूरों पर अत्यधिक कर लगा दिया जाता था लेकिन पादरी, सामन्त एवं कुलीन वर्ग कर मुक्त थे। बहुसंख्यक जनता भूखी नंगी थी। जिसके परिणाम स्वरूप फ्रांस की जनता क्रांति के लिए प्रेरित हुए।
3. सामाजिक कारण - फ्रांस का समाज तीन वर्गों में विभक्त था - पादरी वर्ग, कुलीन वर्ग, जनसाधारण वर्ग। पादरी वर्ग में कैथोलिक चर्च के उच्च पादरी या उच्च धर्माधिकारी आते थे। उच्च पादरी वर्ग विशेष अधिकारों से युक्त थे। इनका जीवन भोग-विलास एवं वैभव से परिपूर्ण था। यह वर्ग अपने विशेषाधिकारों का दुरूपयोग करने लगा था। इनका चारित्रिक एवं नैतिक पतन हो गया था। ये समाज में केवल घृणा के पात्र बन गए थे। कुलीन वर्ग में सामन्त, राजपरिवार के सदस्य, एवं उच्च अधिकारी शामिल थे। यह वर्ग प्राप्त विशेषाधिकारों का जनसाधारण पर दुरूपयोग करते थे। फ्रांस की जनता इस वर्ग के शोषण से ऊब चुकी थी और क्रांति के लिए प्रेरित हो गयी।
4. लेखकों एवं दार्शनिक के विचार का प्रभाव - तत्कालीन दार्शनिको ने अपने विचारो एवं लेखकों के माध्यम से फ्रांस की जनता को भ्रस्ट राजतंत्रीय प्रणाली से अवगत कराया और उन्हें क्रांति के लिए प्रेरित किया। महान दार्शनिक 'रूसो' ने अपनी कृति 'सामाजिक समझौता (Social Contract) में राजा के दैवीय अधिकारों पर कठोर प्रहार किया। एक अन्य विचारक 'मान्टेस्क्यू' अपनी रचना में स्पिरिट ऑफ़ लॉ (Sprit Of Lows) में राजा की निरंकुशता एवं अयोग्यता का खुलकर विरोध किया। जिस कारण फ़्रांसिसी क्रांति के लिए मजबूर हो गए।

फ्रांस की क्रांति के प्रमुख घटनाएं

क्रांति का आरम्भ - फ्रांस की प्राचीन संसद एसेट्स जनरल में तीन सदन थे अर्थात तीनो वर्गो के प्रतिनिधि थे। प्रत्येक वर्ग का अलग-अलग अधिवेशन होता था। राजा ने नया कर लगाने के लिए 1789 ई० में इसका अधिवेशन बुलाया। जनसाधारण वर्ग के सदस्यों ने इसका विरोध किया और संयुक्त अधिवेशन की मांग की। राजा तथा दरबारी वर्ग ने विरोध करते हुए सभा को भंग करना चाहा। जनसाधारण वर्ग ने सभा से हटने से इंकार कर दिया। इसी बीच 'तृतीय सदन क्या है' प्रश्न पर हंगामा होने लगा।फ्रांस के प्रसिद्ध विवेधता 'एबीसीएज' ने एक पुस्तक वितरित की जिसमे लिखा था- "तृतीय सदन ही राष्ट्र का पर्याय है" लेकिन सरकार इसकी उपेक्षा कर रखी है। 6 मई, 1789 ई० में तीनो वर्गो ने अलग-अलग अधिवेशन किया। जनसाधारण वर्ग का नेतृत्व 'मीराबो' ने किया।
टेनिस कोर्ट की शपथ - फ्रांस के तत्कालीन राजा लुई सोलहवाँ ने सामन्तों, कुलीनों और पादरियों के दबाव में आकर जनसाधारण वर्ग के सदन को बन्द कर दिया राजा के इस कृत्य के विरोध में तृतीय वर्ग के सभी सदस्य सभा भवन के निकट स्थित टेनिस कोर्ट के मैदान में इकट्ठे हो गए। तृतीय वर्ग के नेता 'मिरबो' के अध्यक्षता में एक संकल्प लिया गया कि जब तक हम देश के संविधान का निर्माण नही कर लेते तब तक हम टेनिस कोर्ट से नही हटेंगे। यह घटना 'टेनिस कोर्ट की शपथ' के नाम से विख्यात है।
राष्ट्रीय सभा - तृतीय सदन की इस घोषणा से राजा लुई डर गया और 27 जून, 1789 ई० को तीनो सदनों की संयुक्त बैठक का की अनुमति दे दी। एसेट्स जनरल को राष्ट्रीय सभा की मान्यता दे दी। इस सभा ने 9 जुलाई, 1789 को संविधान का कार्यभार ग्रहण किया।
बास्तीन का पतन - राजा और सामन्तों ने मिलकर इस सभा को भंग करने की योजना बनाई। पेरिस में यह अफवाह फ़ैल गयी की कि राजा विदेशी सेना की मदद से देशभक्तो और क्रांतकरियों को मार डालना चाहती है। इस पर पेरिस की जनता उत्तेजित हो गयी और 14 जुलाई, 1789 को फ्रांस की जनता ने बास्तील की जेल को नष्ट कर दिया और कैदियों को मुक्त कर दिया। इस तिथि को फ़्रांसिसी राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाते हैं।