दुनिया में ऐसा कौन व्यक्ति होगा जो किसी न किसी धर्म से सम्बन्ध न रखता हो । वास्तव में तो सच्चाई यह है कि धर्म के बिना जीवन एक दैत्य के जीवन जैसा है । धर्म के बिना जीवन जीना बहुत आसान है, क्योंकि धर्म का विलोम शब्द अधर्म है और अधर्म का रास्ता बुराई का रास्ता होता है, और बुराई का रास्ता बहुत आसान होता है । इसके विपरीत धर्म का रास्ता कठिन होता है क्योंकि यह हमे सत्य की ओर ले जाता है ।

दुनिया में अनेक धर्म है, हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन सभी धर्मो के जीवन यापन में भिन्नता है । लेकिन सभी धर्मों का मूल कर्म ही है । यद्यपि सभी धर्म हमे अच्छाई की ओर ले जाते है । हमे अच्छे बुरे का ज्ञान कराते है, हमे सत्य कर्म के लिए प्रेरणा मिलती है ।

लेकिन सच तो यह है कि धर्म का न तो कोई रूप है, न ही कोई रंग है । धर्म न तो काला है न ही लाल धर्म जल की तरह पारदर्शी है।

"धर्म तो वह नदी है, जो सच्चाई के मार्ग पर बहती है और सच्चाई का वह मार्ग मानव द्वारा निर्मित होता है और सच्चाई का मार्ग तभी निर्मित होता है, जब मानव अच्छे कर्म करता है"- राजेंद्र कुमार

हम चाहे जो भी धर्म अपनाये पर हमे अपने सत्य कर्म को नही भूलना चाहिए क्योंकि यही सत्य कर्म तो उस धर्म का मूल है जिसको हमने अपनाया है । सच में धर्म एक कर्म है, कर्म में प्रेम, प्रेम से विनय है और धर्म में परिश्रम और लगन है । प्रकृत ने हमे जीवन-यापन के लिए हर साधन के साथ-साथ धर्म दिया है, ताकि हम प्रकृत की रक्षा कर सके ।

यद्यपि आपने दुनिया में बड़े-बड़े धर्म सम्मेलनों देखा और सुना होगा, लेकिन धर्म का मूल आप को हर शहर में, हर गली में देखने को मिल जाएगी ।

"आपने कभी किसी भले मानव को किसी की मदद करते हुए देखा होगा, यही तो हमारा धर्म है"
"आपने कभी किसी को अनजान बीमार की सेवा करते हुए देखा होगा, यही तो हमारा धर्म है"
"आपने किसी को किसी ज़रूरत मन्द को दान देते हुए देखा होगा, यही तो हमारा धर्म है"
"आपने कभी किसी को पेड़ पौधों की देखभाल करते हुए देखा होगा, यही तो हमारा धर्म है"
"आपने कभी किसी को किसी पर दया करते हुए देखा होगा, यही तो हमारा धर्म है"

दया ही धर्म का मूल है। जब तक ह्रदय मे दया है, तब तक धर्म उस पर टिका हुआ है, दया की अनुपस्थिती मेँ धर्म का कोई अस्तित्व नही है।

धर्म को समझना इतना जरूरी नही है कि जितना धर्म के मूल को समझना

सच तो यह है कि धर्म का मूल बड़ा ही सीधा और सरल है जिसे समझने के लिए हमे विद्वान् बनने की जरूरत नही है | वास्तव में धर्म के पाखंडी विद्वान् धर्म के सरल वा सीधे तत्वों को न बताकर दुनिया को सदियों से भ्रमित कर रहे हैं | धर्म के मूल को समझना मानवता के लिए आवश्यक है | धर्म ने हमें कोमल ह्रदय दिया है फिर हम कौन होते हैं इस कोमल ह्रदय को कठोर करने वाले |

हकीकत में धर्म का मूल ही धर्म है लेकिन इसमें आडम्बर रूपी जहरीले तत्वों को जोड़कर इसे इतना जटिल बना दिया गया है कि मानव धर्म के मूल तक पहुँच ही नही पा रहे हैं | जिससे मानव मानव न रहकर दानव बनता जा रहा है |

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धर्म ने प्रकृति को नही बल्कि प्रकृति ने पहले इंसानों को फिर इंसानों ने धर्म को जन्म दिया है, इसीलिए धर्म और इंसानों को हमेशा प्रकृति के अनुसार बदलते रहना चाहिए |

" लेखक- राजेन्द्र कुमार