हर्यक वंश 

बिम्बिसार -  हर्यक वंश का संस्थापक बिम्बिसार था । बिम्बिसार के शासनकाल में मगध साम्राज्य का विकास हुआ । वह महात्मा बुद्ध का समकालीन था । उसके द्वारा विजय और विस्तार की शुरू की गई नीति अशोक की कलिंग विजय के साथ समाप्त हुई । बिम्बिसार ने वैवाहिक सम्बन्धो से अपनी स्थिति मजबूत की । उसने तीन विवाह किए उसकी प्रथम पत्नी कोसलराज की पुत्री और प्रसेनजीत की बहन थी । कोसलदेवी के साथ दहेज में प्राप्त काशी ग्राम से उसे एक लाख की आय होती थी । इससे पता चलता है की राजस्व सिक्को में वसूल किया जाता था । इस विवाह से कोसल के साथ उसकी शत्रुता समाप्त हो गई । उसकी दूसरी पत्नी वैशाली की लिच्छवी राजकुमारी चेल्हना थी और तीसरी रानी मद्र कुल के प्रधान की पुत्री थी । विभिन्न राजकुलों से वैवाहिक सम्बन्धो के कारण बिम्बिसार को बड़ी राजनैतिक प्रतिष्ठा मिली और इस प्रकार मग़ध राज्य को पश्चिम और उत्तर की ओर फैलने का मार्ग प्रशस्त हो गया । 

अजातशत्रु - बौद्ध ग्रंथो  अनुसार बिम्बिसार ने लगभग 544 से 492 ईसा पूर्व तक 52 साल शासन किया । उसके उसका पुत्र अजातशत्रु 492-460 ईसा पूर्व सिंहासन पर बैठा । अजातशत्रु ने अपने पिता की हत्या कर सिंहासन पर बैठा । उसके शासन काल में बिम्बिसार राजकुल का वैभव अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंच गया था । उसने दो लडालिया लड़ी और तीसरी के लिए तैयारी की थी । अपने समूचे शासनकाल में उसने विस्तार की आक्रामक नीति से काम लिया । इस कारण काशी और कोसल ने मिलकर  उसका मुकाबला किया । मगध और कोसल के बीच लम्बे समय तक संघर्ष जारी रहा । अंत में अजातशत्रु की विजय हुई । कोसल नरेश को अजातशत्रु के साथ अपनी पुत्री का विवाह करने और अपने जमाई को काशी सौंप कर सुलह करने के लिए विवश होना पड़ा । 

उदायिन - अजातशत्रु के बाद उद्यीन 460-444  ईसा पूर्व मगध की गद्दी पर बैठा । उसके शासन की महत्वपूर्ण घटना यह है कि उसने पटना में गंगा और सोन के संगम पर एक किला बनवाया । इसका कारण यह था कि पटना मगध साम्राज्य के मध्य भाग में पड़ता था । मगध का साम्राज्य  उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण से छोटानागपुर की पहाड़ियों तक फैला हुआ था । पटना की स्थिति, जैसा कि आगे पता चलेगा, सामरिक दृष्टि से बड़े महत्व की थी । 

                                                       शिशुनाग वंश

कालाशोक - कालाशोक 396 ईसा पूर्व में मगध का शासक बना । इसने वैशाली के स्थान पर पाटलिपुत्र को अपनी राजधानी बनाया । उसके शासनकाल में 387 ईसा पूर्व में वैशाली में द्वितीय बौद्ध संगीति का आयोजन हुआ । इस बौद्ध संगीति में बौद्ध संघ के बीच मतभेद हो जाने के कारण यह  धर्मस्थविर और महासांघिक नामक दो सम्प्रदायों में विभक्त हो गया।कालाशोक की मृत्यु के बाद उसके उत्तराधिकारियों ने 346 ईसा पूर्व तक मगध पर शासन किया  । 

                                                          नन्द वंश

शिशुनाग वंश के बाद नन्दो का का शासन शुरू हुआ । ये मगध के सबसे शक्तिशाली शासक सिद्ध हुए । इनका शासन इतना शक्तिशाली था कि सिकंदर ने, जो उस समय पंजाब पर हमला कर चूका था, पूर्व की ओर आगे बढ़ने की हिम्मत नही की । नन्दो ने कलिंग को जीत कर मगध की शक्ति को बढ़ाया । विजय के स्मारक के रूप में वे कलिंग से जिन-की मूर्ति उठा ले गए, ये सभी बातें महापद्म नन्द के शासनकाल में घटित हुई । उसने अपने को एकरात कहा है ।