गुप्त वंश - गुप्तकाल  प्राचीन भारतीय इतिहास का स्वर्णकाल था । यह युग शांति एवं सुव्यवस्था का काल था इस काल के पराक्रमी शासको ने सम्पूर्ण भारत में राजनीतिक एकता का सूत्रपात किया । गुप्तकाल में भारत ने सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, साहित्यिक, वैज्ञानिक एवं कला के क्षेत्र में अभूतपूर्व उन्नति की । चन्द्रगुप्त प्रथम (319-324) -
घटोत्कच के पश्चात उसका पुत्र चन्द्रगुप्त प्रथम शासक बना । वह गुप्त वंश का प्रथम स्वतंत्र शासक था, जिसने 'महाराजाधिराज' की पदवि धारण की थी । उसने 319 ईसा में एक संवत् चलाया जिसे गुप्त संवत् कहते हैं । इसके शासनकाल की महत्वपूर्ण घटना लिच्छवि राजकुमारी कुमार देवी से विवाह की पुष्टि 'राजा-रानी' प्रकार के सिक्के से होती है।

समुद्रगुप्त (325-375) - चन्द्रगुप्त के मृत्यु के पश्चात उसका पुत्र समुद्रगुप्त राजसिंहासन पर बैठा । समुद्रगुप्त स्वयं एक महान योद्धा एवं कुशल सेनापति था ।गद्दी पर बैठते हुए ही उसने दिग्विजय की योजना बनाई । अपने विजय अभियानों के द्वारा उसने सम्पूर्ण उत्तरी भारत पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया । आर्यावर्त का प्रथम विजय अभियान, दक्षिणा का विजय अभियान, आर्यावर्त का द्वितीय विजय अभियान, आटविक राज्यों पर  विजय उसके प्रमुख अभियान थे, 
1. आर्यावर्त के प्रथम विजय के समय उसने अच्युत, नागसेन, गणपतिनग तथा कोटकुलज को हराया।
2. दक्षिणापथ के राज्यों में कुल 12 राज्य थे - कौशल, महाकान्तर, कॉरल, पिष्टपुर, एरण्डपल्ल, काँची, अवमुक्त, बेंगी, पालक्क, देवराष्ट्र, तथा कुष्ठलपुर 
3. आर्यावर्त के द्वितीय युद्ध में 9 राजा थे - रुद्रदेव, मतील, नागदत्त, चंद्रवर्मा, गणपतिनग, नागसेन, अच्युत नंदी और बल वर्मा थे । 
4. सीमांत प्रदेशो के राज्यों में पूर्व की तरफ समटत, डवाक, कामरूप, नेपाल, तथा करतूपुर थे । 
5. समुद्रगुप्त ने कुछ विदेशी राज्यों से संबन्ध स्थापित किये, जिनके नाम थे - देवपुत्र, शहिषाहानुशाही, शक, मुरण्ड, सिंहल और सर्वदीपवासि । 
अपने इन विजय अभियानों के माध्यम  उसने एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की। समुद्रगुप्त का साम्राज्य उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिण में नर्मदा नदी के तट तक विस्तृत था । । 

रामगुप्त (375-380 ईस्वी) - विशाखदत्त द्वारा लिखित नाटक 'देवीचन्द्रगुप्तम्' के अनुसार, समुद्रगुप्त के पश्चात उसका निर्बल पुत्र रामगुप्त गद्दी पर बैठावह एक विलासी निर्बल और कायर शासक था । ऐसा अनुमान की एक बार किसी शक राजा से उसका युद्ध छिड़ गया जिसमे वह स्वयं घिर गया और चित्त पड़ गया । ऐसी स्थिति में उसने अपनी रक्षा के लिए रानी ध्रुव देवी को शक के रनिवास में भेजना स्वीकार कर लिया । उसका छोटा भाई चन्द्रगुप्त यह अपमान सह न सका । अपने वंश भाभी के सम्मान की रक्षा के लिए एक चाल चली । वह स्वयं ध्रुव देवी के वेश में उस राजा के खेमे में में गया और वहीं उसकी हत्या कर दी और सिंहासन पर अपना अधिकार कर लिया । 

चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य (375-414 ईस्वी )  - रामगुप्त के बाद चन्द्रगुप्त द्वितीव गद्दी पर बैठा और उसने कुशलता पूर्वक शासन किया । उसने शको को पराजित करके उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में नर्मदा नदी तक और पश्चिम में काठियावाड़ से लेकर पूर्व में बंगाल तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया तथा विक्रमादित्य की उपाधि ग्रहण की । उसके शासनकाल में चीनी यात्री फाह्यान भारत आया । उसने अपने यात्रा-निवारण में चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य के शासन-प्रबंध की कोटि-कोटि प्रशंसा की।उसके दरबार में नवरत्न - कालिदास, धन्वन्तरि, क्षपणक, अमरसिंघ, शंकु, बेतालभट्ट, घटकर्पर, वराहमिहिर, वरुच्चि नवरत्न थे । उसका शासनकाल स्वर्णकाल के रूप में प्रसिद्द है । 

कुमारगुप्त (415-455) - चन्द्रगुप्त द्वितीय के पश्चात उसका पुत्र कुमारगुप्त साम्राज्य की गद्दी पर बैठा । उसके सबसे पहले ज्ञात सिक्के की तिथि 415 ईस्वी और सबसे बाद की तिथि 455 ईस्वी प्राप्त है । उसके शासनकाल के 13 अभिलेख तथा अनेक सिक्के प्राप्त हुए । 

स्कंदगुप्त (455-467) - कुमारगुप्त के पश्चात उसका पुत्र स्कंदगुप्त मगध के राजसिंहासन पर बैठा । जूनागढ़ से मिले अभिलेख के अनुसार उसे गद्दी पर बैठने के लिए अपने भाइयो से संघर्ष करना पड़ा । स्कंदगुप्त का युद्ध हूणों से हुआ और अपनी राज्य की रक्षा की । स्कंदगुप्त ने सुदर्शन झील का पुनर्निमाण कराया । 

गुप्तकालीन भारत - गुप्तकालीन प्राचीन भारत के इतिहास का मध्ययुग है । पहले का सारा इतिहास इसमें समाप्त होता है । यह वह काल है जब देश की प्रतिभा का प्रत्येक दिशा में विकास हुआ । इसलिए इसे भारतीय इतिहास का स्वर्णकाल कहा जाता है ।