मौर्य वंश - मौर्य वंश का संथापक चन्द्रगुप्त मौर्य था । वह भारत प्रथम ऐतिहासिक सम्राट था, जिसने भारतीय वसुंधरा पर प्रथम बार एक विशाल साम्राज्य की स्थापना कर भारत  राजनितिक एकता को एक सूत्र में बांधने  प्रयास किया ।

चन्द्रगुप्त मौर्य का जीवन - चन्द्रगुप्त वंश की भांति उसका प्रारम्भिक जीवन भी विवाद ग्रस्त है ।  इस सम्बन्ध में निश्चित और प्रामाणिक सामग्री उपलब्ध नहीं है ।  अनुश्रुतियों में उसको  ग्रामीण मयूरपोषक  जाती के किसी सरदार पुत्र कहा गया है । कुछ विद्वानो के अनुसार उसके पिता की मृत्यु किसी सीमावर्ती झगड़े में हो गई थी और उसकी माता भागकर जीवन रक्षा हेतु पाटिलपुत्र  आई । उस समय चन्द्रगुप्त माता के गर्भ में था ।
पाटिलपुत्र  उसका जन्म हुआ । कुछ दिनों तक उसका बाल्यकाल किसी ग्रामीण के यहाँ व्यतीत हुआ । तत्पश्चात एक शिकारी ने उसका पालन पोषण किया । वहीं किसी प्रकार उस पर चाणक्य की दृष्टि पड़ी जो बालक के शौर्य एवं साहस  प्रभावित होकर अपने साथ तक्षशिला  गए । चाणक्य ने नन्द सम्राट द्वारा कभी अपमानित होकर उसका नाश करने की प्रतिज्ञा की थी । उसने उसी समय चन्द्रगुप्त राजगद्दी प्रतिष्ठितं करने का संकल्प किया । मालूम होता है कि किसी कारण से मौर्य सम्राट और चाणक्य दोनों  नन्द सम्राट से रुष्ट थे और उन्होंने उसे अपदस्थ करने मे आपस में सहयोग का षणयंत्र किया ।


चन्द्रगुप्त की विजये और साम्राज्य विस्तार 

 पंजाब एवं सिंध विजय - सिकंदर के प्रस्थान के साथ ही भारत के पश्चिमोत्तर प्रदेशो में विद्रोह हो उठा तथा अनेक यूनानी क्षत्रप ,मौत के घाट उतार दिए गए  उनमे आपस में विद्वेष एवं घृणा  भावना बढ़ी । 323 ईसा पूर्व में सिकंदर  मृत्यु के बाद परिस्थितियां और बिगड़ गई । फलतः पंजाब एवं सिंधु क्षेत्र में अव्यवस्था फ़ैल गई । इस परिश्थिति  लाभ चन्द्रगुप्त को मिला अब  उसने क्षत्रपों के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया होगा । इस कार्य में उसको चाणक्य का साथ मिला होगा । चन्द्रगुप्त ने 321 ईसा पूर्व इस प्रदेश पर विजय प्राप्त कर लिया होगा । 

मगध विजय - सिंधु और पंजाब पर अपनी स्थिति मजबूत करने के बाद चन्द्रगुप्त ने चाणक्य  सहायता से मगध  विजय प्राप्त करने का प्रयास किया । चन्द्रगुप्त ने सर्वप्रथम मगध साम्राज्य के केंद्रीय भाग पर आक्रमण किया और असफल रहा । अपनी इस भूल  सुधर  सीमांत प्रदेशो को जीता और बाद में नन्दो की राजधानी पर विजय प्राप्त की । 

सेलुकस से युद्ध - सिकंदर  सेनापतियों में, जो उसके मरते ही परष्पर लड़ने लगे, सेलूक्स ईसा से 312 वर्ष पूर्व प्रधान गया । उसने 305 ईसा वर्ष पूर्व सिंधु नदी को पर चन्द्रगुप्त का सामना किया  संधि की शर्तो से यह ज्ञात होता है कि सेलूकस चन्द्रगुप्त मौर्य से हर गया था । 
  दोनों पक्षों के मध्य संधि की शर्ते निम्नलिखित थी -
  • दोनों पक्षों के मध्य वैवाहिक सम्बन्ध हुआ । ऐसा कहा जाता है कि चन्द्रगुप्त से सेलूकस ने अपनी पुत्री का विवाह कर दिया । 
  • सेलूकस अपने राज्य के चार प्रान्त चन्द्रगुप्त को दे दिए । इन प्रांतो के नाम कलन्दर, काबुल, हेरात,बलूचिस्तान थे । 
  • चन्द्रगुप्त ने सेलूकस को 500 हाथी उपहार में दिए । 
  • इसके अतिरिक्त भारतीय सम्राट  दरबार में सेलूकस का राजदूत मेगस्थनीज रहने लगा । 
पश्चिम भारत की विजय - सौराष्ट्र जूनागढ़ में प्राप्त रुद्रदामन के शिलालेख से पता चलता है कि अर्जयत  पहाड़ से निकलने वाली दो नदियों पर चन्द्रगुप्त मौर्यके प्रांतीय शासक पुश्यगुप्त वैश्य ने सुदर्शन झील  पर एक बांध बनवाया था इसमें सिंचाई की जाती थी बाढ़ से भी सुरक्षा होती थी  आधार पर कहा जाता है कि चन्द्रगुप्त मौर्य का पश्चिमी भारत बप्र भी अधिकार था ।

चन्द्रगुप्त का साम्राज्य विस्तार - चन्द्रगुप्त एक विशाल साम्राज्य का स्वामी था  । सेलुकस द्वारा उसे जो प्रदेश प्राप्त हुए उनके फलस्वरूप उसके साम्राज्य की सीमा हिन्दुकुश पर्वत तक पंहुच गई जो वास्तव में भारत की वैज्ञानिक सीमा है । इस सम्बन्ध में इतिहासकर स्मिथ कथन बड़ा महत्वपूर्ण है , "दो दो हजार साल से भी अधिक पहले, भारत के प्रथम सम्राट ने उस वैज्ञानिक सीमा को अधिकृत किया, जिसके लिए ब्रिटश उत्तराधिकारी ब्यर्थ ही आंहे भरते रहे बौर जिसे 16वीं तथा 17वीं शताब्दी के मुगल शासक भी कभी पूर्णतया अपने अधिकार में न रख सके । 

बिन्दुसार - चन्द्रगुप्त के 24 वर्ष के शासनकाल के पश्चात 298-273 ईसा पूर्व उसका पुत्र सिंहासन पर बैठा जिसका दूसरा नाम अमित्रघात था । वह चन्द्रगुप्त के विशाल साम्राज्य को ज्यों का त्यों बनाये रखा, यद्यपि उसके शासनकाल के अंतिम दिनों में उसके विरुद्ध एक सार्वजानिक विद्रोह प्रारम्भ होने लगा था । वह पश्चिमी एशिया तथा मिश्रा के यूनानी शासकों के साथ मित्रतता बनाये रखा बिन्दुसार २५ वर्ष तक शासन करता रहा और ईसा से 273 वर्ष पूर्व उसकी मृत्यु हो गई ।

सम्राट अशोक - बिन्दुसार के मृत्यु के उपरांत भारत  इतिहास-गगन पर उस महान सम्राट अभ्युदय हुआ जो भारत को विश्व इतिहास में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है । यह महत्वपूर्ण सम्राट इतिहास में सम्राट अशोक महान के नाम से प्रसिद्ध है । जब बिन्दुसार के पश्चात अशोक सिंहासन पर बैठा तो वह शासन काल से बिल्कुल अनिभिज्ञ न था । अपने पिता के शासन काल में ही वह मध्य भारत तथा तक्षशिला का शासक रह चुका था । प्रारम्भ में एक विद्रोह उसके शासन काल में हुआ लेकिन उसने विद्रोह का दमन कर दिया । बौद्धमत एक किदवन्ति के अनुसार उसका सिन्हासनारोहण शांतिपूर्वक नही हुआ था । सिंहासन पर बैठने के लिए उसने अपने एक भाई को मारना पड़ा । इससे उसका राजतिलक 4 वर्षो तक रुका रहा । यदि इस कथन को सत्य मान लिया जाये तो उसके राजयभिषेक की तिथि 269 ईसा वर्ष पूर्व ठहरती है । 

उपाधि - शिलालेखो में अशोक ने प्रायः अपने नाम के साथ 'प्रियदर्शी' की उपाधि लगाई है।इसके अतिरिक्त उसने अपने लिए आदरसूचक 'देवानां प्रिय' की उपाधि भी प्रयुक्त की।

अशोक का धर्म - अशोक अपने जीवन काल के प्रारंभिक काल में शिव का उपासक था।उस समय हिन्दू धर्म और ब्राह्मणो में उसकी श्रद्धा थी।उसके भोजनालय में प्रतिदिन प्रतिदिन सहस्रों पशुओं की हत्या कर मांस तैयार किया जाता था । पर कलिंग युद्ध के बाद उसकी यह प्रवित्ति बदल गई। उसने अपने जीवन का मूल मंत्र अहिंसा बना लिया।अशोक 13 वें शिलालेख से ज्ञात होता है की कलिंग-विजय के पश्चात शीघ्र ही देवानां प्रिय धम्म के अनुकरण, धम्म में प्रेम और धम्म के उपदेश के प्रति उत्साहित हो उठा इन्ही बांतो के आधार पर डॉ हेमचन्द्र रॉय चौधरी ने अशोक को बौद्ध धर्माव लम्बी होना स्वीकार किया और लिखे की इसमें संदेह के लिए स्थान नही है कि अशोक बौद्ध बन गया।भब्रू शिला लेख में उसने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया की बुद्ध, धम्म और संघ में उसका विश्वास था।

अशोक का साम्राज्य-विस्तार 

अशोक महान ने लगभग 40 वर्षो तक शासन किया । इस लम्बे शासन काल में उसके केवल दो ही युद्धों का उल्लेख प्राप्त होता है । 1. कश्मीर से युद्ध का सम्बन्ध 2. कलिंग से युद्ध का सम्बन्ध।पश्चिमोत्तर सीमा में अशोक का साम्राज्य तक्षशिला से और आगे तक विस्तृत था ।  कहा जाता है कि सीरिया के एन्टिओक्स द्वितीय के साम्राज्य की पूर्वी सीमा से अशोक के पश्चिमी सीमा मिलती थी ।