इसा पूर्व छठी शताब्दी में धार्मिक आंदोलन का प्रबलतम रूप हम बौद्ध  धर्म की शिक्षाओं तथा सिद्धांतों में पाते हैं । बौद्ध धर्म की स्थापना महात्मा बुद्ध ने की । महात्मा बुद्ध का जन्म कपिलवस्तु के निकट लुम्बिनी नामक ग्राम में हुआ था । इनके  बचपन का नाम सिद्धार्थ था । इनके पिता का नाम शुद्धोधन तथा माता का नाम महामाया था कालांतर में इनके पिता ने यशोधरा नामक सुंदरी राजकुमारी से इनका विवाह कर दिया । 28 वर्ष की अवस्था में उनके एक पुत्र राहुल का जन्म हुआ।इनका मन सांसारिक जीवन से ऊब गया और 29 वर्ष की आयु में सत्य की खोज  लिए इन्होने गृह-त्याग दिया।यह घटना महाभिनिष्क्रमण के नाम से प्रसिद्ध है ।
 ज्ञान की खोज में ये इधर-उधर भटकते  रहे और अंत में गया में उरुवेला नमक स्थान पर पीपल के वृक्ष के नीचे समाधिस्थ अवस्था में   इन्हे ज्ञान प्राप्त हुआ । ज्ञान प्राप्ति के बाद महात्मा बुद्ध सारनाथ आये और यहाँ पर अपना प्रथम उपदेश दिया और अपने धर्म के प्रचार में लीन हो गए । 483 ईसा पूर्व में इनका देहावसान कुशीनगर में हो गया । यह घटना बौद्ध धर्म में 'महापरिनिर्वाण' के नाम से जानी जाती है । बौद्ध धर्म की शिक्षाओं से प्रभावित होकर सम्राट अशोक व कनिष्क ने इसे राजकीय धर्म बनाया तथा इसके प्रचार व प्रसार के लिए बहुत से कार्य किये । महापरिनिर्वाण के के बाद बुद्ध के अस्थि अवशेष  को 8 भागो में विभाजित किया । मगध के शासक अजातशत्रु तथा इस क्षेत्र के गणराज्यो ने स्तूप निर्मित कर इसे सुरक्षित रखा । बौद्ध धर्म के विषय में हमें विषाद ज्ञान पाली त्रिपिटक से प्राप्त होता है । महात्मा बुद्ध के अनुसार जीवन में दुःख है । इस दुःख से मुक्ति प्राप्ति करने के लिए इन्होने चार आर्यसत्यों का पालन करना बताया ।

बौद्ध धर्म के सिद्धांत 

1. चार आर्य सत्य - महात्मा बुद्ध ने जिन चार आर्यसत्यों का उपदेश दिया, वे इस प्रकार है -
  • जीवन में दुःख ही दुःख है । 
  • इस दुःख का कारण तृष्णा है । 
  • दुःख  दूर करने के लिए उसके कारण का निवारण आवश्यक है । 
  • दुःख निरोधक मार्ग आस्तांगिक मार्ग कहलाता है । 
2. आस्तांगिक मार्ग - गौतम बुद्ध ने बताया कि आस्तांगिक मार्ग पर चलकर ही मानव अपने दुःखो का अंत कर सकता है । ये आस्तांगिक  निम्न प्रकार है ।
  • सम्यक् दृष्टि - जीव को सत्य-असत्य , उचित-अनुचित भेद करके ही किसी किसी कार्य को करना चाहिए। 
  • सम्यक् संकल्प - हिंसा से रहित संकल्प करना चाहिए । 
  • सम्यक् कर्म - जीव को सदैव अच्छे कर्म करना चाहिए । 
  • सम्यक् जीविका - प्रत्येक जीव को सदाचार एवं परिश्रमपूर्वक धनोपार्जन करना चाहिए । 
  • सम्यक् व्यायाम - प्रत्येक जीव को विवेकपूर्ण प्रयत्न एवं परिश्रमयुक्त जीवन-यापन करना चाहिए । 
  • सम्यक् स्मृति - अपने कर्मो के प्रति विवेक तथा सावधानी को निरंतर स्मरण रखना चाहिए । 
  • सम्यक् समाधी - प्रत्येक जीव को अपने चित्त की समुचित एकाग्रता बनाये रखनी चाहिए । 

3. दस शील - प्रत्येक जीव को अपने आचरण की पवित्रता बनाये रखने के लिए महात्मा बुद्ध द्वारा प्रतिपादित 'दस शील' का पालन करना चाहिए ।
  • सत्य 
  • अहिंसा 
  • चोरी न करना 
  • धन संग्रह न करना 
  • ब्रह्मचर्य का पालन करना 
  • नृत्य  और संगीत का त्याग 
  • सुगन्धित पदार्थो का त्याग 
  • असमय भोजन न करना 
  • कोमल शय्या का त्याग 
  • कामिनी एवं कंचन का त्याग 
  दस शील के अंतर्गत प्रथम पांच गृहस्थों के तथा शेष साधुओं के लिए है । 

4. ईश्वर में अविश्वास - बौद्ध धर्म अनीश्वरवादी है । यह ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नही रखता । 
5. कर्मवाद - बौद्ध धर्म के अनुसार जीव को बिना कर्म किये मोक्ष प्राप्त करना संभव नहीं है । 
6. जाती-पाँति का विरोध - बौद्ध धर्म जाती-पाँति का घोर विरोधी है । यह धर्म मानव समानता का पक्षपोषण करता है । 
7. निर्वाण प्राप्ति - बौद्ध धर्म के अनुसार जीवन का अंतिम लक्ष्य मोक्ष प्राप्त कर सभी प्रकार के बंधनो से मुक्त हो जाना है । 

बौद्ध धर्म की महासंगीतिया  

1. प्रथम बौद्ध संगीति - 483 ईसा पूर्व में अजातशत्रु के समय हुई । 
2. द्वितीय बौद्ध संगीति - 383 ईसा पूर्व में कालाशोक के समय हुई । 
3. तृतीय बौद्ध संगीति - 251 ईसा पूर्व में मौर्य सम्राट अशोक के समय हुई । 
4. चतुर्थ बौद्ध संगीति - प्रथम शताब्दी में कनिष्क के समय हुई । 

बौद्ध धर्म के संप्रदाय 

बौद्ध सिद्धांतो को लेकर बौद्ध अनुयायियों में मतभेद हुआ और कनिष्क के समय यह धर्म दो सम्प्रदायों में विभक्त हो गया - हीनयान , महायान ।  बौद्ध धर्म के आदर्शो को यथावत स्वीकार करने वाले 'हीनयानी' तथा समय के अनुसार उन सिद्धांतो में परिवर्तन कर उन्हें अपनाने वाले 'महायानी'  कहलाये । 
इन दोनों सम्प्रदायों में मूलभूत अंतर इस प्रकार थे -
  1. हीनयान बौद्ध धर्म का मूल था । महायान नवीन रूप । 
  2. हीनयान के अनुसार मनुष्य को निर्वाण प्राप्ति के लिए स्वयं प्रयास करना चाहिए ईश्वर व् देवतावों से प्रार्थना नहीं करना चाहिए । महायान ने बुद्ध को ईश्वर के रूप में प्रतिष्ठित किया । 
  3. हीनयान बुद्धत्व की प्राप्ति के लिए भिक्षु बनने एवं संसार त्यागने पर बल देते थे । महायान नही । 
  4. महायान परोपकार पर बल देते हैं । जबकि हीनयान व्यक्तवादी धर्म है । 
  5. महायान आत्मा पुनर्जन्म तथा तीर्थों में विश्वास करता है । हीनयान मूर्ति पूजा एवं भक्ति में विश्वास नही करते । 
  6. हीनयान साधना की कठोर पद्धति अपनाने पर बल देते । महायान साधारण उपायों पर बल देते है ।