ईसा पूर्व छठी शताब्दी विश्व इतिहास में धार्मिक क्रांति का युग था । इस युग में विश्व के अनेक देशो के धार्मिक क्षेत्र में युग प्रवर्तनकारी घटनाओं तथा महापुरुषो का उदय हुआ । ईरान में जरथ्रुस्त, चीन में कनफ्यूशियस तथा यूनान में सुकरात ने धर्म और दर्शन के क्षेत्र में लोगो को नयी दिशा दी । भारत में जैन की विचारधाराओं ने नवीन क्रान्ती उत्पन्न कर दी । यहाँ हम  प्रभावशाली जैन धर्म तथा उनके प्रवर्तको पर विचार करेंगे ।


 प्राचीन भारत के धर्मों मे जैन धर्म का महत्वपूर्ण एवं विशिष्ट स्थान है । यह भारत का प्राचीनतम धर्म है । जैन धर्म में 24 तीर्थंकर हुए ।

जैन धर्म के 24 तीर्थंकरो
1-  ऋषभदेव
2-  अजितनाथ
3-  सम्भवनाथ
4-  अभिनंदननाथ
5-  सुमतिनाथ
6-  पद्मप्रभु
7-  सुपार्श्वनाथ
8-  चन्द्रप्रभु
9-  सुविधिनाथ
10- शीतलनाथ
11- श्रेयांसनाथ
12- वासुपूज्य
13- विमलनाथ
14- अनन्तनाथ
15- धर्मनाथ
16- शान्तिनाथ
17- कुन्थनाथ
18- अरहनाथ
19- मल्लिनाथ
20- मुनिसुब्रतनाथ
21- नेमिनाथ
22- अरिष्टनेमि
23- पार्श्वनाथ
24- महावीर स्वामी
महावीर स्वामी जैन धर्म के अन्तिम तीर्थंकरो थे ।

महावीर स्वामी की शिक्षाएँ

महावीर स्वामी का जन्म वैशाली के निकट कुण्डग्राम के एक क्षत्रिय राजपरिवार में हुआ था । इनके पिता का नाम सिध्दार्थ और माता का नाम त्रिशला था । 30 वर्ष की आयु में महावीर स्वामी सत्य की खोज में घर परिवार छोड़कर निकल पड़े । 12 वर्षों की कठोर तपष्या के बाद जाम्भिक ग्राम के निकट ऋजुपालिका तट पर ईन्हे कैवल्य (सर्वोच्च) ज्ञान की प्राप्ति हुई । ईन्द्रियो के जीतने के कारण यह जिन तथा महान पराक्रमी होने के कारण महावीर कहलाये । 30 वर्षों तक अपने धर्म का प्रचार किया और अन्त में 72 वर्ष की आयु में राजग्रृह के समीप पावापुरी में इन्हे निर्वाण की प्राप्ति हुई । इनके जन्म और मृत्यु के सम्बन्ध में मतैक्य नही है । कुछ विद्वान इनका जन्म 540 ईसा पूर्व मानते है और कुछ 599 ईसा पूर्व मानते है । कुछ विद्वान इनकी मृत्यु 468 ईसा पूर्व और कुछ 527 ईसा पूर्व मानते है ।

जैन धर्म के प्रमुख सिध्दान्त इस प्रकार है

1) ईश्वर में अविश्वास - जैन धर्म के अनुसार सृष्टिकर्ता ईश्वर नहीं है , सृष्टि अनादिकाल से विद्दमान है। संसार के सभी प्राणी अपने-अपने संचित कर्मो के अनुसार फल भोगते है । कर्म फल ही जन्म और मृत्यु का कारण है । कर्म फल से छुटकारा पाकर ही व्यक्ति निर्वाण की ओर अग्रसर हो सकता है । जैन धर्म में संसार दुःखमूलक माना गया है । दुःख से छुटकारा पाने के लिये संसार का त्याग आवश्यक है ।
2) त्रिरत्न - सम्यक ज्ञान , सम्यक दर्शन , और सम्यक आचरण जैन धर्म के त्रिरत्न हैं । सम्यक ज्ञान का अर्थ है शंका-विहीन सच्चा और पूर्ण ज्ञान । सम्यक् दर्शन का अर्थ है  सत एवं तीर्थंकरो में विश्वास तथा सांसारिक विषयों से उत्पन्न सुख-दुःख के प्रति समभाव ही सम्यक् आचरण है । जैन धर्म के अनुसार त्रिरत्नो का पालन करके व्यक्ति जन्म मरण के बन्धन से मुक्त हो सकता है और मोक्ष को प्राप्त कर सकता है ।


3) पंचमहाव्रत - जैन धर्म मे मोक्ष प्राप्ति के लिए पंच महाव्रतो के पालन को अनिवार्य और आवश्यक माना गया है । ये इस प्रकार है ।



  •  अहिंसा - जैन धर्म में अहिंसा सम्बन्धी सिद्धांत अत्यंत कठोर हैं । मन, वचन तथा कर्म से किसी के प्रति असंयत व्यवहार हिंसा है । पृथ्वी के समस्त जीवों के प्रति दया का व्यवहार अहिंसा है । 
  •  सत्य - सत्य बोलना चाहिए । जीवन में  कभी भी असत्य नहीं बोलना चाहिए  क्रोध और मोह जागृत  होने पर मौन रहना चाहिए । जैन धर्म के अनुसार भय अथवा हास्य-विनोद में भी असत्य नहीं बोलना चाहिए । 
  • अस्तेय - चोरी नहीं करना चाहिए और न ही अनुमति के बिना किसी की कोई वस्तु ग्रहण करना चाहिए । 
  • अपरिग्रह - भिक्षुओं के लिए किसी प्रकार के संग्रह करने की प्रवृत्ति वर्जित है , क्योंकि संग्रह करने से आसक्ति की भावना बढ़ती है, इसलिए मनुष्य को संग्रह करने का मोह छोड़ देना चाहिए । 
  • ब्रह्मचर्य - इसका अर्थ है इन्द्रियों को वश में रखना । ब्रह्मचर्य का पालन भिक्षुओं के लिए अनिवार्य माना गया । 

4 ) कर्म की प्रधानता - जैन धर्म कर्म की प्रधानता में विश्वास करता है । जैन दर्शन में कर्मबंधन तीन बलों - मन - बल , वचन - बल , और कार्य - बल के द्वारा स्वीकार किया गया है । मन के विचार से ही शुभ-अशुभ कर्मो का बंधन हो जाता है । 
5 ) आत्मा की सत्ता में विश्वास - महावीर स्वामी सभी चेतन प्राणियों में आत्मा का अस्तित्व मानते हैं । प्रत्येक जीव में आत्मा स्थाई अजर-अमर होती है । मृत्यु हो जाने पर उसकी आत्मा नया शरीर धारण कर लेती है । 
6 ) जैन धर्म में तपष्या तथा अहिंसा पर अधिक बल दिया जाता है । 
7 ) जैन धर्म वेदों को प्रामाणिक नहीं मानता । 
8 ) जैन धर्म में तीर्थंकरो को सर्वाधिक महत्त्व  दिया जाता है ।
9 ) जैन धर्म कर्मकांडो का विरोधी है ।
10) धर्म में पंचपरमेष्टि माना गया है ।
11) जैन धर्म के अनुसार जीवन का अंतिम लक्ष्य निर्वाण है । निर्वाण के द्वारा ही मनुष्य जन्म मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है ।

जैन धर्म के प्रमुख सम्प्रदाय

महावीर स्वामी की मृत्यु के पश्चात उनकी शिक्षा को लेकर जैन मतानुयायियो का विरोध प्रारम्भ हुआ और जैन धर्म दो सम्प्रदायों में विभक्त हो गया । एक मत 'श्वेताम्बर' कहलाया जिसके समर्थक स्थूलभद्र हुए और दूसरा मत 'दिगम्बर' कहलाया जिनके समर्थक भद्रबाहु हुए । 

श्वेताम्बर एवं दिगम्बर में अंतर 

1) श्वेताम्बर श्वेत वस्त्र धारण करते थे , जबकि दिगम्बर वस्त्रहीन रहते थे । 
2) श्वेताम्बर स्त्री के लिए मोक्ष मानते थे , जबकि दिगम्बर इनके विरुद्ध थे । 
3) श्वेताम्बर ज्ञान प्राप्ति के बाद भोजन ग्रहण करने में विश्वास रखते थे , जबकि दिगम्बर  अनुसार आदर्श साधु को भोजन नहीं ग्रहण करना चाहिए । 
4) श्वेताम्बर जैन आगमों (12 अंग , 12 उपांग , 6 प्रकीर्णक , 6 वेदसूत्र , 4 मूलसूत्र तथा अन्य) में विश्वास करते थे, जबकि दिगम्बर केवल 14 पूर्वो में विश्वास करते थे । 
5) श्वेताम्बर के अनुसार महावीर ने यशोदा से विवाह किया , जबकि दिगम्बर के अनुसार विवाह नहीं किया । 
6) श्वेताम्बर 19वें तीर्थंकर को स्त्री मानते हैं , जबकि दिगम्बर पुरुष मानते हैं । 
7) श्वेताम्बर पार्श्वनाथ के अनुयायी थे , जबकि दिगम्बर महावीर के अनुयायी थे। 
         
इन मतभेदों के पश्चात भी दोनों सम्प्रदायों का दार्शनिक आधार एक ही है । श्वेताम्बर संप्रदाय के प्रमुख आचार्य सिद्धसेन , दिवाकर , हरिभद्र , स्थूलभद्र आदि थे । इस मत का प्रासार मुख्यतः गुजरात तथा उसके आसपास के क्षेत्रो में हुआ । दिगम्बर संप्रदाय के प्रमुख आचार्य भद्रबाहु , नेमिचन्द्र , ज्ञानचंद्र , विद्यानंद आदि थे । इस मत का प्रासार उत्तरी भारत के मथुरा तथा दक्षिण में मैसूर क्षेत्रो में हुआ ।